Monday, 27 August 2018

ज़मीर

मेरे जिस्म पे कैसे आशिक़ी के छाले पड़ गये है,
आंखों में खून है और होंठ मेरे काले पड़ गये है।

वो हवेलियों मैं अय्याशियां करता रहा उम्र भर,
आज देखो उसके खाने के भी लाले पड़ गए है।

मिरी सख्सियत को ललकारने चला था कम्बख़त,
देखो आज उसी के गिरेबान कितने मैले पड़ गए है।

उनकी महफ़िलो की शान हुआ करते थे हम भी,
आज देखो इश्क़ में हम कितने अकेले पड़ गए है।

जिनकी गहराई में डूब जाया करता था हर आशिक़,
वो अबसार देखो मोहब्बत में आज गीले पड़ गए है।

कभी उसी ने मुझसे मोहब्बत की कसमें खाई थी,
मुझसे पहले मिरे मेहबूब के हाथ पीले पड़ गए है।

वो मिरे ज़मीर का सौदा करने निकला है 'सारथी"
उसे बताओ कोई के उसी के घर में ताले पड़ गए है।

©sandeep_sarthi