मुसलसल मेरे इश्क़ की खनक का मौज़ू हो जाती है।
मुझे नहीं मालूम तेरे कानो में झुमके कैसे लगेंगे, फिर भी ना जाने क्यों दिल करता है कि एक दफा झुमकों को ये नसीब मयस्सर कर दूं।
बदलते मौसमों की रुत में आड़े आना मेरे बस का नहीं लेकिन, कोई रुत कोई मौसम, तेरी अंगड़ाई में रुकावट बनें तो बताना, उसे वापस क़ुदरत की बाहों भेज दूंगा।
ख़ुदा से मेरा ताअल्लुक़ कुछ बेहद नफ़रत भर तो नहीं लेकिन, जब भी तेरे बारे बात की, उसने गद्दारी ही की।
मैं जानता हूँ तेरे नसीब में छत से टपकती हुई बारिश की बूंदों से खेलना ही है, जो शायद मैं तुझको दे पाऊं।