Friday, 20 December 2019

तेरी तस्वीर की निगाहों में जो चमक ठहरी रहती है, 
मुसलसल मेरे इश्क़ की खनक का मौज़ू हो जाती है।
मुझे नहीं मालूम तेरे कानो में झुमके कैसे लगेंगे, फिर भी ना जाने क्यों दिल करता है कि एक दफा झुमकों को ये नसीब मयस्सर कर दूं।
बदलते मौसमों की रुत में आड़े आना मेरे बस का नहीं लेकिन, कोई रुत कोई मौसम, तेरी अंगड़ाई में रुकावट बनें तो बताना, उसे वापस क़ुदरत की बाहों भेज दूंगा।
ख़ुदा से मेरा ताअल्लुक़ कुछ बेहद नफ़रत भर तो नहीं लेकिन, जब भी तेरे बारे बात की, उसने गद्दारी ही की।
मैं जानता हूँ तेरे नसीब में छत से टपकती हुई बारिश की बूंदों से खेलना ही है, जो शायद मैं तुझको दे पाऊं।

Sunday, 15 December 2019

अच्छा होता - नज़्म

अच्छा होता गर ज़िन्दा होते,
नर, नारी और नभ के तारे।

यूं सिर फुटव्वल ना होती,
कोई खून का प्यासा ना होता।
होता भी तो कोई नेता होता,
ये संविधान बेचारा ना होता।

आदमियत ना शर्मिंदा होती,
हैवानियत ना ज़िन्दा होती।
ज़िन्दा होती गर लक्ष्मी बाई,
फिर निर्भया ना मुर्दा होती।

संसद ना अखाड़ा बनती,
जन जन का ये नारा बनती।
मज़हबी फ़रमान ना आते,
लोकनीति ही जरिया बनती।

आसमान ना आग उगलता,
चैनल सारे सच ही कहते।
ज्योतिषी सब मर जाते और,
वक़्त के तारे सच ही कहते।

अच्छा होता गर ज़िन्दा होते,
नर, नारी, और नभ के तारे।

सारथी