Thursday, 22 August 2019

महफ़िल

इन महफ़िलो से वास्ता अब नई-नई सी बात नहीं।
2      212    2   22    11 12 12 2  21  12 -   29
तेरे बगैर पर महफ़िलो में महफ़िलो सी बात नहीं।
22 121 2 1112   2  1112     2  21   12  -   30

तुम ग़ैर के साथ हो गए, हम इंतेज़ार में मर गए,
2   21 2  21   2 12   2    1221 2 2     2-    29
ये भी तुम्हारी अपनी मर्ज़ी हैं, ख़ैर कोई बात नहीं।
2  2   122   22     12  2   21 22  21   12। - 31
सारथी

Wednesday, 21 August 2019

मुखौटे पे अब कौन वार करें।

आ आ ना पहली बार करें।
2222  2211 2-  16
अपना-अपना ऐतेबार करें।
2222  2221  12  - 18

मुझको तो कोई खौफ़ नहीं,
22     2  22 21  12-   16
मुखौटे पे अब कौन वार करें।
122   1  2 21  21  12 - 17

मैं झल्ला के दे मारूँगा,
2  12     2 2 222 -   15
बातें गर कोई बेकार करें।
22   2  22  221  12 - 18

इश्क़ की शाम का मुंतज़िर हूँ,
11    2   21  2   1111  2  -  15
मेहरबानी गर सरकार करें।
21122   11 1121  12   -18

Saturday, 17 August 2019

नाम अभी होने को हैं

रुको शाम अभी होने को हैं।
मेरा जाम अभी होने को हैं।

मिरे मेहबूब के होंठों पे,
मिरा नाम अभी होने को हैं।
रुको हवाओं रात होने दो।
ज़रा सितारों से बात होने दो।
मैं बहुत नाशाद हूँ।
मुझे शाद होने दो।
वक़्त के परिंदों रुको ज़रा।
ऐ मेरे रिन्दों रुको ज़रा।
मयखाना ज़रा हिजाब में हैं,
सरेआम अभी होने को हैं।
मिरे मेहबूब के होंठों पे,
मिरा नाम अभी होने को हैं।

और लाँछन लगा लेना।
मुझे फिर से दग़ा देना।
अभी रुको तो ज़रा सा लोगो।
मेरी सुनो तो ज़रा सा लोगो।
मैं सबकुछ भूल गया हूँ,
मुझे बस याद होने दो।
अभी बहुत संभला हुआ हूँ।
मुझे बरबाद होने दो।
तुम बाद में बातें कर लेना।
मैं फिर से आँखें भर लूँगा।
कुछ रिश्तों की ख़ातिर मैं,
कुछ जी लूँगा फिर मर लूँगा।
मेरा दाम अभी होने को हैं।
नाम-बदनाम अभी होने को हैं।
मिरे मेहबूब के होंठों पे,
मिरा नाम अभी होने को हैं।

Thursday, 8 August 2019

सूरज आया था सबेरा लेकर।
रात चली गई ख़ासारा लेकर।

मेरा ही तो मुझमें रहता नहीं,
मैं क्या करूँगा तुम्हारा लेकर?

पिछली दफ़ा ही इतना सताया,
मरना हैं इश्क़ दोबारा लेकर!

फ़रमाया जाते हो! कुछ दे जाओ,
क्या करोगे दिल हमारा लेकर।

Friday, 2 August 2019

जन्नत में दोज़ख सी तन्हाई देखी हैं।

जन्नत में दोज़ख सी तन्हाई देखी हैं।
हसीन चेहरे संग सुनी कलाई देखी हैं।

हिज्र का आलम मेरे मत्थे चढ़ गया,
मैंने मेरे महबूब की सगाई देखी हैं।

मुफलिसी में रईसों सा मज़ा लिया,
कच्ची छत, रस्सी की चारपाई देखी हैं।

उसने मेरी आँखें चुम ली थी इक रोज़,
काफ़िर ने क्या खूब खुदाई देखी हैं।

जन्नत को मरना ज़रूरी नहीं लोगो,
बाप ने घर बेटी की शहनाई देखी हैं।

संदीप कुथे 'सारथी"