Tuesday, 30 October 2018

Rehte hain

मुझको बारहा ही ये रुलाते रहते हैं।
तेरे इल्ज़ाम सर पे मंडराते रहते हैं।

मोहब्बतों में मुसलसल रुसवा नहीं हुआ मैं,
हाँ नफ़रतों में पर वो मुझको सताते रहते हैं।

तुझसे दुश्मनी कर लूं तो गिर जाऊंगा ख़ुद में,
तेरे जैसे दुश्मन ज़माने में आते-जाते रहते हैं।

Sunday, 28 October 2018

Le aya huu

जो तुमसे पढ़ी ना गई वो कहानी ले आया हूँ।
तेरे मुकर जाने की हर बात ज़ुबानी ले आया हँ।

तेरी तस्वीर से लिपटकर रोया-कमाल ये भी नहीं हैं,
तू देख कि तेरी तस्वीर की आँख में पानी ले आया हूँ।

एक गुलाब पैरों में कुचल दिया गया तो क्या हुआ,
मैं बचाकर तेरे पैरों से मेरी ज़िन्दगानी ले आया हूँ।

गुमाँ इस बात का नहीं कि बच कर निकल गया मैं,
मलाल ये हैं कि जैसी की वैसी जवानी ले आया हूँ।

तुझ पर क्या-क्या कुर्बान किया याद नहीं मुझको,
फिक्र ये हैं क्या तेरी कोई मेहरबानी ले आया हूं।

अब शराब हैं तेरी जगह और मेरी जगह मैं ही हूँ,
देख मैं तेरे इश्क़ की वो शाम पुरानी ले आया हूं।

Tuesday, 23 October 2018

दिखाया जाए

सोचता हूं के अब सूरज को भी आंख दिखाया जाए,
बहुत रोशनी लिए फिरता है इसे औकात दिखाया जाए।

बहुत ग़ुरूर है आसमाँ को  ऊंचाई पर तो चलो,
फिर इसे अपने बुजुर्गों का रुबाब दिखाया जाए।

ये बारिशें भी बहुत इतराती है आजकल मौसम में,
अब इन्हें भी अपनी आंखों का आब दिखाया जाए।

होगा हसीन बहुत चाँद पर मिरे मेहबूब सा तो नही,
उसे चूड़ी, कंगन, झुमके और हिज़ाब दिखाया जाए।

वो बच्चा बहुत तन्हां से रहने लगा हैं देखो 'सारथी",
छुपा कर सब ज़ख़्मो को उसे कोई ख़्वाब दिखाया जाए।

©sandeep_sarthi

Thursday, 11 October 2018

छाती लगाते हैं।

हम हर मसले का तोड़ जज़्बाती लगाते है।
ग़ुरूर उफ़ान पर हो माथे पर मिट्टी लगाते हैं।

जब-जब ये सियासतें नफरतें उगलती है,
हम मस्जिद में जा कर आरती लगाते हैं।

जब सूरज भी रौशनी देने से इनकार कर देता हैं,
हम अपने घर मे दीया और बाती लगाते हैं।

उसके पैदा होने पर बहुत मातम मनाया था,
रुख़सत होती हैं तो बाबा छाती से छाती लगाते हैं।

हम ज़िंदा हैं तो लिखते हैं कि लिखने को ज़िंदा हैं,
गुमाँ आप करें हम नाम के आगे 'सारथी" लगाते हैं।

संदीप 'सारथी"

Monday, 8 October 2018

ग़ज़ल - डर लगता हैं

उल्टे-सीधे पैमानें से डर लगता हैं।
ज़िंदगी तेरे याराने से डर लगता हैं।

यादों में इक उम्र गुज़ारी हैं मैंने,
तेरी आँखों के मयख़ाने से डर लगता हैं।

तेरी इबादतों में इस क़दर रुसवा हुआ हूं,
अब तो मुझको बुतखाने से डर लगता है।

ज़िंदगी ने ज़ख्मो का जो अंबार दिया है,
फिर मुझको ज़िंदा रहने से डर लगता हैं।

आँसुओ को मैं अब पलको में छुपा लेता हूँ,
अब इन बच्चो को बहाने से डर लगता हैं।

Sandeep 'sarthi"