Friday, 30 November 2018

ऊपर कर

क़िरदार ज़रा सा ऊपर कर।
तेरा नाम ज़रा सा ऊपर कर।

तेरे लफ्ज़ ज़रा से हल्के हैं,
ख़याल ज़रा सा ऊपर कर।

यहाँ मोहब्बतें घुट रहीं हैं,
प्यार ज़रा सा ऊपर कर।

ये बुझेगी तो मर जायेंगे,
मशाल ज़रा सा ऊपर कर।

इनका भरना ठीक नहीं हैं,
दरार ज़रा सा ऊपर कर।

इसको देखा-उसको देखा,
जमाल ज़रा सा ऊपर कर।

रात का ख़वाब-दिन बेख़बर,
ख़्वाब ज़रा सा ऊपर कर।

दाग दिख जाते हैं यहाँ से भी,
मेहताब ज़रा सा ऊपर कर।

घर का जलना ठीक नहीं हैं,
आफ़ताब ज़रा सा ऊपर कर।

ऐरो-गैरो से डरता क्यों हैं,
रुबाब ज़रा सा ऊपर कर।


सारथी

Tuesday, 30 October 2018

Rehte hain

मुझको बारहा ही ये रुलाते रहते हैं।
तेरे इल्ज़ाम सर पे मंडराते रहते हैं।

मोहब्बतों में मुसलसल रुसवा नहीं हुआ मैं,
हाँ नफ़रतों में पर वो मुझको सताते रहते हैं।

तुझसे दुश्मनी कर लूं तो गिर जाऊंगा ख़ुद में,
तेरे जैसे दुश्मन ज़माने में आते-जाते रहते हैं।

Sunday, 28 October 2018

Le aya huu

जो तुमसे पढ़ी ना गई वो कहानी ले आया हूँ।
तेरे मुकर जाने की हर बात ज़ुबानी ले आया हँ।

तेरी तस्वीर से लिपटकर रोया-कमाल ये भी नहीं हैं,
तू देख कि तेरी तस्वीर की आँख में पानी ले आया हूँ।

एक गुलाब पैरों में कुचल दिया गया तो क्या हुआ,
मैं बचाकर तेरे पैरों से मेरी ज़िन्दगानी ले आया हूँ।

गुमाँ इस बात का नहीं कि बच कर निकल गया मैं,
मलाल ये हैं कि जैसी की वैसी जवानी ले आया हूँ।

तुझ पर क्या-क्या कुर्बान किया याद नहीं मुझको,
फिक्र ये हैं क्या तेरी कोई मेहरबानी ले आया हूं।

अब शराब हैं तेरी जगह और मेरी जगह मैं ही हूँ,
देख मैं तेरे इश्क़ की वो शाम पुरानी ले आया हूं।

Tuesday, 23 October 2018

दिखाया जाए

सोचता हूं के अब सूरज को भी आंख दिखाया जाए,
बहुत रोशनी लिए फिरता है इसे औकात दिखाया जाए।

बहुत ग़ुरूर है आसमाँ को  ऊंचाई पर तो चलो,
फिर इसे अपने बुजुर्गों का रुबाब दिखाया जाए।

ये बारिशें भी बहुत इतराती है आजकल मौसम में,
अब इन्हें भी अपनी आंखों का आब दिखाया जाए।

होगा हसीन बहुत चाँद पर मिरे मेहबूब सा तो नही,
उसे चूड़ी, कंगन, झुमके और हिज़ाब दिखाया जाए।

वो बच्चा बहुत तन्हां से रहने लगा हैं देखो 'सारथी",
छुपा कर सब ज़ख़्मो को उसे कोई ख़्वाब दिखाया जाए।

©sandeep_sarthi

Thursday, 11 October 2018

छाती लगाते हैं।

हम हर मसले का तोड़ जज़्बाती लगाते है।
ग़ुरूर उफ़ान पर हो माथे पर मिट्टी लगाते हैं।

जब-जब ये सियासतें नफरतें उगलती है,
हम मस्जिद में जा कर आरती लगाते हैं।

जब सूरज भी रौशनी देने से इनकार कर देता हैं,
हम अपने घर मे दीया और बाती लगाते हैं।

उसके पैदा होने पर बहुत मातम मनाया था,
रुख़सत होती हैं तो बाबा छाती से छाती लगाते हैं।

हम ज़िंदा हैं तो लिखते हैं कि लिखने को ज़िंदा हैं,
गुमाँ आप करें हम नाम के आगे 'सारथी" लगाते हैं।

संदीप 'सारथी"

Monday, 8 October 2018

ग़ज़ल - डर लगता हैं

उल्टे-सीधे पैमानें से डर लगता हैं।
ज़िंदगी तेरे याराने से डर लगता हैं।

यादों में इक उम्र गुज़ारी हैं मैंने,
तेरी आँखों के मयख़ाने से डर लगता हैं।

तेरी इबादतों में इस क़दर रुसवा हुआ हूं,
अब तो मुझको बुतखाने से डर लगता है।

ज़िंदगी ने ज़ख्मो का जो अंबार दिया है,
फिर मुझको ज़िंदा रहने से डर लगता हैं।

आँसुओ को मैं अब पलको में छुपा लेता हूँ,
अब इन बच्चो को बहाने से डर लगता हैं।

Sandeep 'sarthi"

Monday, 27 August 2018

ज़मीर

मेरे जिस्म पे कैसे आशिक़ी के छाले पड़ गये है,
आंखों में खून है और होंठ मेरे काले पड़ गये है।

वो हवेलियों मैं अय्याशियां करता रहा उम्र भर,
आज देखो उसके खाने के भी लाले पड़ गए है।

मिरी सख्सियत को ललकारने चला था कम्बख़त,
देखो आज उसी के गिरेबान कितने मैले पड़ गए है।

उनकी महफ़िलो की शान हुआ करते थे हम भी,
आज देखो इश्क़ में हम कितने अकेले पड़ गए है।

जिनकी गहराई में डूब जाया करता था हर आशिक़,
वो अबसार देखो मोहब्बत में आज गीले पड़ गए है।

कभी उसी ने मुझसे मोहब्बत की कसमें खाई थी,
मुझसे पहले मिरे मेहबूब के हाथ पीले पड़ गए है।

वो मिरे ज़मीर का सौदा करने निकला है 'सारथी"
उसे बताओ कोई के उसी के घर में ताले पड़ गए है।

©sandeep_sarthi