Saturday, 29 June 2019

बिछड़ने का इरादा कर रही हो ना।

तुम बिछड़ने का इरादा कर रही हो ना!
प्यार खुद से कुछ ज़्यादा कर रही हो ना!

सोचती हो दूर जाने से मोहब्बत मर जाएगी।
यानी ज़िंदगी तुम्हारे बगैर गुज़र जाएगी।

ठीक सोचती हो कि ज़िंदगी गुज़र जाएगी।
गलत सोचती हो कि मोहब्बत मर जाएगी।

मोहब्बत तो रूह के दरमियां हैं, और रूह कभी मरती नहीं ना!
और बिछड़ना तो मोहब्बत की सदाकत (सच्चाई) हैं,
या यूं कह दो की सदाकत की अलामत (लक्षण) हैं।
तो किस बिनाह पर सोच रही हो कि मोहब्बत मर जाएगी!

और कौन किससे बिछड़ सकता हैं, ना मैं तुमसे ना तुम मुझसे!
तुम तो मेरे अंदर हो और मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा।
हक़ीक़त में मुझमें तुम्हारे सिवा हैं ही क्या जिसे मैं खो दूँगा।

बताओ कैसे बिछड़ोगी!

Saturday, 15 June 2019

मैं कह दूंगा तुम मेरी हो।

कितनी मुद्दत (a bunch of time) बीती हैं, हमको तुमको इक सांस हुए।
कितने ही अल्फ़ाज़ (शब्द) लिखे हमने तेरे एहसास लिए।
उन एहसासों को उन अल्फाज़ो को,
तेरे मेरे सब जज़्बातों को।
जो दुनियां आँख उठाकर देखें,
तब दुनियां की तक़रीरों (दलीले) से,
उनकी सारी तहरीरों (गवाही) से,
कह दूँगा तुझसे दूरी हो।
मैं कह दूँगा तुम मेरी हो।

जब तुझको ज़माना डराने आये,
जब तेरा आँचल मैलाये।
तू दूर ना जाना-पास ही रहना,
मेरे दिल की आस ही रहना।
अच्छे भले सब लोगो से,
उनके सब मंसूबो (इरादे) से,
मैं लड़ूंगा तेरी ख़ातिर,
तुम तो मेरी धुरी (base) हो,
मैं कह दूँगा तुम मेरी हो।

जब शाम ढले और रात मिले,
जब सूरज का आघात मिले।
जब चांदनी भी घबरायेगी,
जब रौशनी भी लरजायेगी। ( शर्माना)
सबको हड़काउंगा खूब डराउंगा,
मैं तेरे होने से ही इतराउंगा।
सबसे कहूंगा बे मतलब हो।
एक तुम ही मेरा मज़हब हो।
इक तुम ही तो बहुतेरी हो।
मैं कह दूँगा तुम मेरी हो।

हो ग़म या कोई मुश्किल,
दीवाना तेरा नहीं बुज़दिल,
सबकुछ सहूँगा तुझ संग रहूंगा,
तेरा हूँ ना ! तेरा हूँ।
तेरा हूँ, तेरा रहूंगा।
आसमान से ऊपर हो,
हो शाम की दोपहर हो।
कोई भी मजबूरी हो,
कह दूँगा तुम मेरी हो।

हो कोई जश्न का मौसम,
कि हो पतझड़ आने को।
पहाड़ो से हो बर्फ पिघलती,
या दरिया हो उड़ जाने को।
मंदिरो की आन हो,
या मस्जिद की अज़ान हो।
दीवाली के दीप तुझी से रौशन हैं।
ईद तुझी से आती है,
हो सावन की रिमझिम,
या रमज़ान की रोज़ेदारी हो।
तुम सहरी तुम ही तो इफ्तारी हो।
मैं कह दूँगा तुम मेरी हो।

Thursday, 13 June 2019

जीने का बहाना ढूंढते हैं।

जीने का बहाना ढूंढते हैं।
कोई दर्द पुराना ढूंढते हैं।

आप तो मेरे अंदर हैं ना,
आप क्यों आईना ढूंढते हैं।

एक बरगद ढह गया आज,
परिंद आशियाना ढूंढते हैं।

मुझको भुलाकर अब देखो,
वो मुझ सा दीवाना ढूंढते हैं।

रोना तो मेरे नसीब में हैं,
आप क्यों सिरहाना ढूंढते हैं।

सारथी

Wednesday, 5 June 2019

ना बोला जाएगा ना कुछ बताया जाएगा।

ना बोला जाएगा, ना कुछ बताया जाएगा।
दर्द अपना है तो फिर खुद ही सहा जाएगा।

तुम सरेबाज़ार रोते फिरोगे तो सुनो फिर,
तुमको बारहा बेवजह ही रुलाया जाएगा।

तुम परिंद क़ैद करके क्या जता रहे हो,
मैं जानता हूँ सच को यूं ही टटोला जाएगा।

बेहतर होगा बाज़ आओ अपनी हरकतों से,
मुझसे और ज़्यादा चुप ना रहा जाएगा।

मैंने आँखों से खून बहाया हैं एक मुद्दत,
क्या समझते हो वो खून यूं ही ज़ाया जाएगा।

लौट जाओ अपने कबीलों की ज़ानिब तुम,
बुरा होगा गर मेरे खून में उबाल आ जाएगा।

Sunday, 2 June 2019

दिल की आवाज़

कौन सुनता हैं ?
आज तलक किसने सुना हैं ?
और आगे भी कौन सुनने वाला हैं ?

और अगर कोई सुनना भी चाहे तो कैसे सुने उस आवाज़ को जो सुनाई ही नहीं देती।
हाँ, दिल की आवाज़ कब किसे सुनाई देती हैं, उसे तो बाहर आते ही दफ़्न कर दिया जाता हैं।
वो आवाज़ जो चींखना भी चाहती हैं लेकिन उसके मुँह पर कोई पट्टी बांध दी जाती हैं।
लाचार बहुत लाचार सी वो आवाज़ अगर किसी तरह बाहर आ जाएं तो इस ज़माने को इसकी हक़ीक़त उसकी औक़ात से मुख़ातिब कराए।

इस चालक ज़माने ने आज तलक़ कोई कचहरी भी ना बनाई कि जहाँ दिल का कोई मुआमला दर्ज कराया जा सकें।
कोई वकील भी नहीं मिलता कि जो दिल के मुआमले की पैरवी करें और इंसाफ मिल सके।
ज़माने के महान कहे जाने वाले बड़े ही इज़्ज़तदार लोगो ने कोई कानून, कोई क़िताब भी नहीं लिखी जिसकी बिनाह पर कोई मुलाज़िम ही अपने मुआमले की पैरवी कर सके।