Sunday, 31 March 2019

ज़रा देर से कटेगा

आँखों से ये कहर ज़रा देर से कटेगा।
ज़िंदगी तेरा ज़हर ज़रा देर से कटेगा।

ना दिल उदास हैं ना तू भी पास हैं,
तंहाई का ये सफ़र ज़रा देर से कटेगा।

तेरी यादों ने मेरा बिस्तर समेट लिया,
रात का आखिरी पहर ज़रा से कटेगा।

उसको फ़क़त पत्थर ही मारे जाएंगे,
हर फलदार शजर ज़रा देर से कटेगा।

इसको बचाने बहुत आएंगे 'सारथी"
ये झूठ का लश्कर ज़रा देर से कटेगा।

Saturday, 30 March 2019

तो होगा

कोई मुझसा तेरे दिल मे अब रवां तो होगा।
मेरे बाद तेरे दिल में कोई दूसरा तो होगा।

बेदर्द सी मोहब्बत मेरे साथ चल रही हैं,
मेरे हमनवां से पूछो मेरा इक निशां तो होगा।

इक खाका मेरा अब तो मुझको ही ढक रहा हैं,
किसी दूसरे जहाँ में मेरा चेहरा तो होगा।

Friday, 29 March 2019

रहा हूं मैं

ग़ज़ल नई गुनगुना रहा हूँ मैं।
अब तुझको भुला रहा हूँ मैं।

ज़माने से रुसवा इस कदर हुआ,
खुद ही खुद को मना रहा हूँ मैं।

उलझ गया मंज़िलो के ताने बाने में,
यार छोड़ो अब घर जा रहा हूँ मैं।

आँखों ने इनकार कर दिया सो,
अब दिल को सुला रहा हूँ मैं।

Thursday, 28 March 2019

तू भी हैं और मैं भी हूँ।

नादानी की एक निशानी तू भी हैं और मैं भी हूँ।
वस्ल हिज्र की एक कहानी तू भी हैं और मैं भी हूँ।

रूह तो अपना काम करेगी लेकिन बात तो ये भी हैं,
थोड़े थोड़े से जिस्मानी तू भी हैं और मैं भी हूँ।

दुनियांदारी क्या होती हैं हम दोनों को मालूम हैं,
अपनी-अपनी आंख का पानी तू भी हैं और मैं भी हूँ।

किसने किसको दग़ा दिया दोनों ही इनकार करें हैं,
कतरे कतरे की बेईमानी तू भी हैं और मैं भी हूँ।

आँखों आंखों बात को कहना हम दोनों को आता हैं,
इक दूजे की प्रेम निशानी तू भी हैं और मैं भी हूँ।

Tuesday, 26 March 2019

बाबा नागार्जुन

कल बाबा नागार्जुन की कुछ रचनाएं सुन रहा था तो आज के हालात के मद्देनज़र कुछ पंक्तियां आ गई, देखिए!

देख नागा तेरे कविकुल को! देख नागा देख।

सत्ता की भाषा बोलते हैं, मज़हबों को तोलते हैं।
सूर्यवंश के ये रखवाले,रात अंधेरी डोलते हैं।
देख नागा देख,

कोई भगवा चोला ओढ़े, कोई हरा झंडा ले आया।
लाल किले की चाहत में जनमानस को ठुकराया।
देख नागा देख,

कोई फिल्मी दुनियां में ऊंचे पद पर बैठ गया,
और सत्ता के जूतों को नागा पूरा पूरा चाट गया।
देख नागा देख,

तू तो जन का नायक था ना तेरे वारिस कैसे हैं,
खुद का थूका खुद ही चाटते तेरे वारिस कैसे हैं।
देख नागा देख तेरे कविकुल को! देख नागा देख।

#बाबानागार्जुन #नागार्जुन #महाकवि #प्रसुनजोशी

करो

तुम रंगों में मज़हब ना बहाया करो।
आदमी हो आदमी को ना ज़ाया करो।

एक शज़र रो रहा था कहीं शाम को,
तुम परिंदों को यूं ना उड़ाया करो।

बस्ती उजड़े घर जले कोई ग़म नहीं,
पर दिल ना किसी का जलाया करो।

साथ उम्र भर का दे सको तो दो,
बस रात भर रुकने ना आया करो।

डोली उठ गई हैं यार की 'सारथी",
उस गली में बारहा ना जाया करो।

सारथी

Monday, 25 March 2019

अपना पैरहन फाड़ के बैठी हैं।
लड़की जो घर पाल के बैठी हैं।

बादलों को कहो कि वहाँ बरसे,
वो नदी नीचे पहाड़ के बैठी हैं।

वो ज़िद्दी लड़की एक नहीं सुनती,
ख़ामख़ा दिल तोड़ताड़ के बैठी हैं।

बेबसी कितनी होगी उसको भी,

सारथी

फिर हो ना हो

ये मुलाक़ात फिर हो ना हो।
ये हसीं रात फिर हो ना हो।

तुमसे बिछड़ेंगे तो हम मर जायेंगे,
ये बिछड़ने की सौगात फिर हो ना हो।

सारथी

Sunday, 24 March 2019

शेर

संजीदगी अब खलने लगी हैं।
आवारगी साथ चलने लगी हैं।

ज़िंदगी का बोझ उतर गया,
लाश पानी पर तैरने लगी हैं।

ज़रा सी बिखरी थी कल वो भी,
आज फिर हँसने खेलने लगी हैं।

मेरे पिन्दार तलक आ गयी थी,
कमबख्त मेरे पैर मलने लगी हैं।

सारथी

तुम मुझे स्वीकार हो

आराधना की प्रीत हो।
तुम मधुर प्रेम गीत हो।
चल-विचल में जो रहें।
जल या थल में जो रहें।
तुम बिलखती आँख हो।
तुम मचलती बात हो।
तुम भक्ति का श्रृंगार हो।
तुम जो भी हो हजार हो।
प्रेम भावना का सार हो।
हाँ तुम मुझसे स्वीकार हो।
हाँ तुम मुझे स्वीकार हो।।
हाँ तुम मुझे स्वीकार हो।।।

दर्पणों की आँख में,
अश्रुओं की बात में,
खामोशी की आवाज में,
सिसकियों के साज़ में,
रूठने की चाह में,
टूटने की आह में,
बाज़ुओं की छांव में,
पीपलों के गांव में,
तुम विलय अपार हो,
साधना का सार हो।
हाँ तुम मुझे स्वीकार हो।

श्रंगार तेरी चाह में हैं,
रूप तेरी राह में हैं,
चाँद, जुगनू, ओस, कलियां,
ये सब तेरी पनाह में हैं।
संस्कारों की हो राजधानी,
सुशीलता की हो निशानी,
राम-सीता की कहानी,
राधा-कृष्ण की जुबानी।
मीरा की कंठ तार हो,
तुम नदी की धार हो।
कश्मीर सी बाहर हो।
मेरी स्वप्न सार हो।
हाँ तुम मुझे स्वीकार हो।

सारथी

बात पर

लाख बंदिश करो मेरे जज़्बात पर।
मैं अड़ा ही रहूंगा मेरी बात पर।

जितना बरसोगे उतने ही ढह जाओगे,
हैं तज़र्बा मुझे मेरे प्रतिघात पर।

इस दफ़ा तुमने पीछे से मारा मुझे,
तरस आ गया तेरी औक़ात पर।

मुझको छोड़ोगे तो तुम भी पछताओगे,
हैं यक़ीं मुझको तेरे भी हालात पर।

धर दिया आपने बेवफ़ा नाम जो,
भर गया दिल बड़ा आपकी बात पर।

सारथी

Saturday, 23 March 2019

आसान कर दिया तुमने

ज़माने भर से अनजान कर दिया तुमने।
हाय जीना बड़ा आसान कर दिया तुमने।

तेरे बाद तो शोहरतों ने पैर पकड़ लिए,
यार दर्द दिया कि एहसान कर दिया तुमने।

सारथी

Der hone se rishta khatm nahin hota

हेलो ?
- कैसे हो ?
- उम्म, ठीक ही हूँ, तुम कैसी हो ?
- मैं भी ठीक ही हूँ।
- कहो आज अचानक कैसे याद किया ?
- ठीक नहीं हुआ ना जो कुछ !
- क्या ठीक नहीं हुआ ?
- इस तरह से हमारा अलग हो जाना!
- अरे जो हो चुका हैं उसकी बातें क्यों करती हो, और कौन अलग हुआ हैं, मैं तो नहीं हुआ।
- मैं बस कुछ गलफ़हमियाँ दूर करना चाहती हूँ!
- मैं किसी ग़लतफ़हमी में हूँ ही नही तो क्या दूर करोगी तुम ?
- #actually मुझे हो गई थी तो!
- तो तुम दूर करो अपनी, मैं क्या करूँ ?
- ज़िन्दगी का कोई भरोसा नहीं हैं, क्या पता फिर कभी ये सब #clear करने का मौका मिले ना मिले इसीलिए सोची की आज!
- 2 साल बाद तुमको ये लग रहा हैं !
खैर कोई नही अब सब ठीक हैं, और मुझे कोई ग़लतफ़हमी नही हैं और ना ही कभी हुई।
- तुम अब भी बिल्कुल वैसे ही हो ना ?
- नहीं बदल गया हूँ बहुत कुछ।
- इस तरह रिश्ता खत्म होना ठीक नहीं था।
- मुझे तो लगा था कि दूरियां बढ़ी हैं,
दूरियां बढ़ने और रिश्ता ख़त्म होने में फ़र्क़ होता हैं।
- लेकिन बहुत देर हो चुकी हैं अब, मैं फ़ोन रखती हूँ।
- तुम वाक़ई वो नहीं हो जिसे मैं जानता हूँ।
एक बात और कि-
देर होने से रिश्ता ख़तम नहीं होता,
फ़क़त इंतेज़ार ज़रा बढ़ जाता हैं।

Indo pak nafrat

आज की शाम दोस्तो के साथ बैठ vnit नागपुर के सामने का नज़ारा देखते वक़्त मौजूदा हालात के मद्देनजर बेसाख़्ता ही ये ख़याल आया कि क्या पड़ोसी मुल्क़ में भी इस वक़्त मेरी तरह के कुछ लड़के इसी तरह किसी सड़क किनारें की टपरी अपने दोस्तों के साथ बैठे सिगरेट का धुआं उड़ा रहे होंगे! क्या वो भी हमारी ही तरह मौजूदा हालात पर बातें कर रहे होंगे।
उनके सामने से भी ऐसी कुछ कारें गुज़र रही होंगी और उस कार में बैठा शख़्स अपने दफ्तर से घर जाने की जल्दी में होगा। और उसकी पत्नी बार-बार उसे कॉल कर के कहाँ हो, कहाँ तक पंहुचे, और कितना वक्त लगेगा, हर रोज़ देर से ही आते हो, आपको office के सिवा किसी बात की फिक्र नहीं हैं, यही सब सुना रही होगी, क्या उसके भी बच्चे घर पर पापा का इंतेज़ार कर रहे होंगे।
यही इसी तरह का गाड़ियों का शोर वहाँ भी होगा ना!
शायद हाँ, हाँ! तो फिर ये इतनी नफरत किस बात की।
सब एक जैसी ही तो ज़िंदगी जी रहे हैं।
फिर ये गोलाबारी, ये जंग जैसे हालात!
कौन और क्यों बनाता हैं।
और हम भी क्यों उनके बहकावे में आ जाते हैं!
सोचिए, और ख़त्म कीजिये ये नफरत।

Maa bholi hain na

तुम्हारी चौखट पर आते ही एक ख़ौफ़ समा गया मुझमें, अब और रुकने का हौसला नहीं था, बेशक़ दिल अब भी मेरे बस में नहीं था और बार बार मुझे रुकने के लिए मजबूर कर रहा था लेकिन मैं जानता था कि इतनी रुसवाइयों के बावज़ूद अगर मैं रुक गया तो फिर कभी चल नहीं पाऊंगा, बल्कि इतना गिर जाऊंगा कि फिर उठने के क़ाबिल भी ना रह पाऊँ!
और मैं चल दिया एक नई दुनियां की ज़ानिब!
जहाँ मैं मेरी मर्ज़ी मेरे तौर तरीकों से जी सकता हूँ।
और मैं खुश हूँ, हाँ! कभी कभी तुम्हारी याद आ जाती हैं, पर मैं तब खुद को समझा लेता हूँ कि उन रुसवाइयों से बेहतर हैं ये ज़िन्दगी। और अब तो शोहरतें भी हैं, जो शायद तुम्हारे साथ रहकर नहीं मिल पाती।
तुम समझ रही हो ना!
मैं खुश हूँ,
नई दुनियां और नए दोस्तो के साथ।
माँ भी अब मुझसे खुश रहती हैं कि अब मैं उनके साथ ज्यादा वक्त बात कर लेता हूँ और ना भी कर पाया तो समझ जाती हैं कि काम की मसरूफियत हैं।
हालाँकि तब भी मैं तुम में ही खोया रहता हूँ, लेकिन माँ को ये सब कहाँ पता हैं, माँ तो भोली हैं ना।
मेरे झूठ को भी सच मान लेती हैं।
हाँ मैं खुश हूँ, और माँ भोली हैं।
बिल्कुल पहले की तरह।
हाँ! माँ पहले भी भोली थी, बस तुमको समझ नहीं आई।

उससे क्यों मान गई।

तुम भी कितनी भोली हो किन बातों में आन गई।
तुम तो मुझसे रूठी थी न फिर उससे क्यों मान गई।

हर रात सुला देती थी मुझको लोरी लगती थी,
अब कोई सदां नहीं आती जाने कहाँ वो ज़ुबान गई।

थका हारा बैठा था दरियां किनारे तन्हां मैं,
भंवरो से तेरी तस्वीर बनी और मेरी थकान गई।

तू जो ज़िन्दगी से रुख़सत हुई तो लगा जैसे,
मस्जिद से रूठकर कोई अज़ान गई।

Friday, 22 March 2019

मज़हबी फासीवाद

मंदिर की मीनारो पर भगवा पताका लहरा रही हैं,
मस्ज़िदों ने भी हरी पताका का बीड़ा उठाया हैं।
और दोनों के बीच वो श्वेत शांत रंग गुम कहीं हैं।
दोनों का बदला मिजाज़ देखकर सकपकाया हैं।

शायद किसी शोक में डूबा हुआ कहीं कराह रहा होगा।
शायद किसी और रंग से लिपटकर, अपने ऊपर लगे खून के दाग, और ज़ख्मो के चीथड़ों को दिखा दिखा,
चुपचाप डरा सहमा हुआ किसी और रंग में डूबा डूबा,
या फ़क़त अकेला तन्हां किसी औरत के मानिन्द,
अपने ज़ख़्मो को सहलाता हुआ आँसू बहा रहा होगा।

अरे संभाल ख़ुद को बच निकल इन रंगों के झुंड से,
न जाने कब कौन रंग डालें तुम्हे किसी एक रंग से।
ये भिन्न भिन्न रंगों के पीछे छुपे कुत्ते नोच लेंगे,
अपना मज़हबी का रंग तेरी रगों में सींच देंगे।
और फिर तु भी उन्ही कौमी रंगों में रंग जाएगा,
चलते चलते फिर आदमी से तू कुत्ता हो जाएगा।

Monday, 11 March 2019

बात हैं

उस एक चेहरे को तरस जाने की बात हैं।
लौट के उसी की तरफ जाने की बात हैं।

उसकी ज़ुल्फ़ें जो रूखी रूखी लगती हैं,
बस एक आंसू के बरस जाने की बात हैं।

अब जो मौसिकी का सुरूर छाया हैं ना,
उसकी चूड़ियों के खनक जाने की बात हैं।

हवाओं से मोहब्बत आसान तो नहीं थी,
बस एक झुमके के लटक जाने की बात हैं।

दरिया में शाम जो मैंने गुज़ारी हैं 'सारथी"
किसी की कमर के लचक जाने की बात हैं।