मंदिर की मीनारो पर भगवा पताका लहरा रही हैं,
मस्ज़िदों ने भी हरी पताका का बीड़ा उठाया हैं।
और दोनों के बीच वो श्वेत शांत रंग गुम कहीं हैं।
दोनों का बदला मिजाज़ देखकर सकपकाया हैं।
शायद किसी शोक में डूबा हुआ कहीं कराह रहा होगा।
शायद किसी और रंग से लिपटकर, अपने ऊपर लगे खून के दाग, और ज़ख्मो के चीथड़ों को दिखा दिखा,
चुपचाप डरा सहमा हुआ किसी और रंग में डूबा डूबा,
या फ़क़त अकेला तन्हां किसी औरत के मानिन्द,
अपने ज़ख़्मो को सहलाता हुआ आँसू बहा रहा होगा।
अरे संभाल ख़ुद को बच निकल इन रंगों के झुंड से,
न जाने कब कौन रंग डालें तुम्हे किसी एक रंग से।
ये भिन्न भिन्न रंगों के पीछे छुपे कुत्ते नोच लेंगे,
अपना मज़हबी का रंग तेरी रगों में सींच देंगे।
और फिर तु भी उन्ही कौमी रंगों में रंग जाएगा,
चलते चलते फिर आदमी से तू कुत्ता हो जाएगा।
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