तुम रंगों में मज़हब ना बहाया करो।
आदमी हो आदमी को ना ज़ाया करो।
एक शज़र रो रहा था कहीं शाम को,
तुम परिंदों को यूं ना उड़ाया करो।
बस्ती उजड़े घर जले कोई ग़म नहीं,
पर दिल ना किसी का जलाया करो।
साथ उम्र भर का दे सको तो दो,
बस रात भर रुकने ना आया करो।
डोली उठ गई हैं यार की 'सारथी",
उस गली में बारहा ना जाया करो।
सारथी
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