कोई मसअला नहीं, बस ज़रा उलझ सा गया हूँ ।
यकीनन इस खेल में मैं ज़रा सा नया-नया हूँ ।
सारथी
किस नाम को पुकारूँ मैं, किस नाम से आवाज़ दूँ।
तुझे किस तरह बुलाऊँ मैं, किस नाम से आवाज़ दूँ।
हैं जो दरमियाँ बेनाम सा एक रब्त अपने आप सा,
तेरी बंदिशों की छांव में इक शख़्स हैं मेरे आप सा,
उस रब्त को, उस शख़्स को,
अब इस तरह सुलझाऊँ मैं,
तेरे नाम से आवाज़ दूँ।
वो रूठता खुद ही से हैं, वो जूझता खुद ही से हैं।
और फिक्रमंद तुम्हारा हैं, वो छूटता खुद ही से हैं।
उस रूठे से किरदार को,
चल इस तरह मनाऊं मैं,
तेरे नाम से आवाज़ दूँ।
तू जो रूठती नहीं कभी, तू जो मुझसे राबता भी हैं।
तू जो होती ही नहीं ख़फ़ा, तुझे सब से वास्ता भी हैं।
तेरे इस सरल से भाव को,
आ इस तरह सताऊं मैं,
मेरे नाम से आवाज़ दूँ।
वक़्त ही की हैं साजिशें सभी।
अपने दरमियाँ बंदिशें सभी।
ये कहाँ से हैं आती सदाएँ,
आती कहाँ से हैं रंजिशें सभी।
कौन आया हैं हमको तोड़ने,
कौन लाया हैं हालतें सभी।
किसकी मर्ज़ी से हम हुए ज़ुदा,
ये कौन दे गया फ़ासले सभी।
दिल की दुनियां घर उजड़ गया,
दिल की दुनियां में दीमकें सभी।
मुझको उससे क्यों रब्त इतना,
मुझको उससे हैं सोहबतें सभी।
उसकी मर्जी से नींद आती हैं,
उसकी मर्जी से करवटें सभी।
'सारथी" सुनो छोड़ो बातों को,
बातों ही से हैं उलझने सभी।
सारथी
Rhyme - waqt ne kiya kya hansi sitam
यही हादसा तो बारहा हुआ।
कौन मेरे जाने से तन्हां हुआ।
किसकी फितरत में मिलना हुआ,
मैं उसका हुआ ना वो मेरा हुआ।
इसकी मर्ज़ी जिसे चाहे ख़ुदा करें,
दिल पर कब जोर किसका हुआ।
मैं उससे रब्त करूँ तो क्यों नहीं,
उसके जैसा और कौन मेरा हुआ।
वो क्यों कर ना मुझको रोकेगी,
सिगरेट पीने से किसका भला हुआ,
उसकी हर बात मानना गवारा हुआ।
वो एक शख़्स जैसे मेरा ख़ुदा हुआ।
सारथी
बदलते मौसमो की तरह चले हो तुम।
हमारे हाथों को छुड़ाकर चले हो तुम।
ये खुशबुएँ तुम्हारी रूह में समाई हैं,
कि खुशबुओं को बेचकर चले तो तुम।
मुहाल ऐसे ज़िंदगानी कर गए हो तुम,
जीते जी कफ़न उढ़ाकर चले हो तुम।
तेरे नसीब में मैं हूँ नहीं कि तू मेरे,
नसीबो को नसीबों सा कर चले हो तुम।
आवाज़ का भी सिलसिला रुक सा गया,
आवाज़ को गले में दफन कर चले हो तुम।
ये गेशुओं के घने साये आज तक़ डराते हैं,
मेरे उदास मन को छोड़कर चले हो तुम।
एक तू मेरा होकर भी मेरा ना हुआ।
और तो दुनियां में क्या-क्या ना हुआ।
मिन्नते, इल्तिज़ा वगैरह तो होता रहता हैं,
रंज इतना सा हैं इश्क़ ज़रा सा ना हुआ।
कितने ऐश तेरी मोहब्बत के नाम हुए,
सिगरेट हुई, जाम हुआ, वादा ना हुआ।
सारथी
हो गया तुझसे ख़फ़ा मैं मगर रोया नहीं।
तुझ को पा तो ना सका हाँ मगर खोया नहीं।
चाँद में ढूंढता रहा अक्स तेरे रुखसार का,
रात सारी बीत गई और मैं सोया नहीं।
इल्ज़ाम दर इल्ज़ाम मुझको झुठलाते रहें,
ज़माने की साज़िशों से मैं मगर हारा नहीं।
नए नए चेहरों ने अक्सर तेरी ही मुलाकात दी,
तू तो फिर भी बीत गया तेरा ज़माना बीता नहीं।
मुझमें तेरे बाद और कोई बवाल नहीं।
ज़िंदा हूँ कि मर गया कोई ख़याल नहीं।
वो भी हँसता खेलता नज़र आता हैं,
उसे भी मेरे हिज्र का कोई मलाल नहीं।
हम दोनों अपने अपने रास्ते चल पड़े हैं,
मुमकिन अब हम दोनों का विसाल नहीं।
माना कि तेरे चाहने वाले और भी हैं,
तेरे रुख़ पे मगर पहले सा जमाल नहीं।
मैं आज़ाद परिन्दों सा उड़ रहा हूँ अब,
अब तू जो करता मेरी देखभाल नहीं।
मेरे रूठने भर से टूट ही जाएगा तू,
इस तरह से भी तू मुझको संभाल नहीं।
तुझे सवाल का जवाब दूँ भी तो कैसे,
तू सवाल का जवाब हैं सवाल नहीं।
तुम प्रेम के प्रतीक निरन्तर,
तुम मर्यादा पुरुषोत्तम,
माँ पिता के आज्ञाकारी,
तुम मानव सर्वोत्तम।
ऊंच नीच के प्रथम विरोधा,
तुम सबरी के वर्णन।
वन में सालों साल बिताएं,
क्यों महल करूँ मैं अर्पण।
तुम हो अजर अमर ओ राजा,
तुम तो नहीं किसी भी मठ में।
जो मान लिया हृदय के अंदर,
तुम हो सब घट घट में।
श्री राम नवमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।।
सारथी
इश्क़, -
क्या होता हैं इश्क़, दो दिलों का मिलना, या उनका बहक जाना!
दो जिस्मों से निकली हुई गर्म सांसो का एक दूसरे में घुलकर शांत हो जाना!
या किसी मंदिर या मस्ज़िद की सीढ़ियों पर किसी फकीर या अमीर के सिर का झुक जाना !
नहीं, ये इश्क़ नहीं।
ये तो ज़रूरतें हैं।
इश्क़ तो इबादत हैं ना !
और इबादत में बहका नहीं जाता।
इबादत में ज़रूरत नहीं होती।
इबादत तो फ़क़त इबादत होती हैं। जिसमे वापसी की उम्मीद नहीं होती। जिसमें खोने का डर नहीं होता।
ना किसी से गिला न कोई शिकायत!
ज़रूरतें मर जाती हैं। और इश्क़ ! इश्क़ तो ज़िंदा रहता हैं, सालों साल, सौ साल, हज़ार साल!
कभी गीतों में, कहीं ग़ज़लों में, कहीं नज़्मों में तो कहीं अफ़सानों में ढल जाता हैं इश्क़।
और उस इश्क़ में खोए हुए दो दिलों की दास्तान इतिहास के पन्नो अमर हो जाती हैं।
इश्क़ कभी नहीं मरता।
किसी पेड़ से गिरते हुए पत्ते में इश्क़ देखा हैं ?
किस तरह वो हवा में इधर उधर लहराता हुआ उस पेड़ से जुदा हो जाने के ग़म में पागल हो जाता हैं। और हवा से लड़ता रहता हैं। उसे हवा का ख़ौफ़ नहीं हैं, उसे हवा से बैर हैं, वो नफ़रत करने लग जाता हैं उसी हवा से जिसकी बदौलत वो उस पेड़ में लटककर झूमता रहा हैं, आज उसी हवा ने उसे पेड़ जुदा किया तो वो बाग़ी हो गया।
तभी तो, तभी तो इश्क़ में बग़ावत नाजायज़ नहीं हैं, ये तो उसूल हैं इश्क़ का की जो बीच आए उससे नफ़रत हो जाती हैं।
और इश्क़ हमेशा एक तरफा होता हैं, बिल्कुल इबादत की तरह।
कभी देखा हैं उस पत्ते को पेड़ से फल मांगते हुए, नहीं ना!
वो तो फ़क़त अपने साथ उस पेड़ की टहनियों को भी लेकर झूमता रहता हैं।
हाँ! इश्क़ खुदगर्ज़ भी होता हैं, अपनी जगह किसी और को नहीं देख सकता तभी तो कभी फल या फूल पेड़ की टहनियों से लटके हो कर भी झूम नहीं सकते।
ये हक़ सिर्फ और सिर्फ पत्ते को हैं।
हाँ इश्क़ खुदगर्ज होता हैं मगर आशिक़ के लिए नहीं!
फ़क़त ज़माने के लिए अपने आसपास छुपे हुए मनचलों और गैर इश्कियां लोगो के लिए।
लेकिन इश्क़ मरता नहीं।
बस रूप बदल लेता हैं।
मेहबूब से ख़ुदा तक इश्क़ कभी नहीं मरता।
वो इस तरह मेरे साथ दिन गुज़ारे जा रहे थे।
कि पाँव हथेली पे रखकर चले जा रहे थे।
उसकी इल्तेज़ा थी उसे आज़ाद किया जाए,
तो उसके बदन से कपड़े उतारे जा रहे थे।
बे-मन से ब्याहने का ज़ख़्म उन्हें मालूम था,
सो वो मेरे बदन पे हल्दी लगाए जा रहे थे।
मैंने उसे हँसाने के वास्ते, क्या कुछ न किया,
वो कौन लोग थे जो उसे रुलाएं जा रहे थे।
दरियां में पत्थर उछालने का शौक़ अच्छा है,
बहुत जज़्बे हौसलें बहुत हैं।
हमने पाले सपने बहुत हैं।
गीत ग़ज़लें गा रहा हूँ पर,
मुँह में मेरे छाले बहुत हैं।
खामोशी का ये सबब हैं,
मैंने मसले उछाले बहुत हैं।
सफेदपोशो के अंदर देखो,
दाग छिटके काले बहुत हैं।
शोहरतों का गुमाँ नहीं हैं,
मैंने खोएं निवाले बहुत हैं।
ये जो मेरी किताब हैं।
तेरे रुख़ का ये हिज़ाब हैं।
मेरे आंसुओं का सैलाब हैं,
और सिसकियों का साज़ हैं।
तेरी मोहब्बतों के नाम हैं।
मेरी अज़ीय्यतों की ज़ुबान हैं।
लिखे सब तेरे कलाम हैं,
ये किताब मेरी कुरआन हैं।
मुफ़लिसी के ढेर में,
ख़्वाहिशों के शोर में,
इक आरज़ू जगी थी जो,
उस आरज़ू की बात को,
तेरे साथ गुज़री रात को,
कुछ लफ्ज़ों में उतारा था,
जो कुछ सफ़े बनाई थी।
ये वही मेरी किताब हैं।
तेरे रुख़ का ये हिज़ाब हैं।
ये क़िताब मेरी ज़िंदगी,
जो तुमसे ना पढ़ी गई।
तेरी आँखों को ज़रा डरना चाहिए।
मेरी आँखों से होकर गुज़रना चाहिए।
मेहंदी वेहंदी सब लग गई हाँथों में,
अब आँखों के लिए सुरमा चाहिए।
वो शख़्स जाते जाते कह रहा था,
उसको ज़रा सा ठहरना चाहिए।
डेटिंग वेटिंग सब बेकार की बातें हैं,
अब मांग में सिंदूर भरना चाहिए।
चूड़ियों का टूटना अपशगुन नहीं होता,
ख़यालों को अब तो सुधरना चाहिए।
पायल उसके पैरों में अच्छी छमक रही हैं,
उसे दो चार कदम और चलना चाहिए।
कान भला क्यों सुने सुने से लग रहें,
वहाँ तो झुमकों को लटकना चाहिए।
मेरी आँखें तेरी आँखों से टकराकर सीधा तेरी मांग का सफर तय करती हैं।
फिर तेरी मांग से धीरे-धीरे फिसलती हुई तेरी नाक पर आ कर ज़रा सी देर के लिए ठहर जाती हैं कि वहाँ अपनी कोई जगह बनाएं और कोई तो निशां छोड़ जाए।
उसके बाद ये थोड़ा दाएँ तो कभी थोड़ा बाएँ सरकती हुई तेरे कानो पर जा लटकती हैं।
शायद जानती हैं कि तेरे कानों को झुमकों की तलाश हैं! और फिर बड़ी ही चालाकी से तेरे गले मे उतर जाती हैं, कमबख्त वहाँ मंगलसूत्र का साइज पता करती रहती हैं जैसे इसे इंतज़ार ही हो कि कब उसे वहाँ उतारा जाएं।
और अब तो हमेशा हमेशा के लिए वहीं ठहर गई हैं।
क्या पता कि गले का नाप कब बढ़े या कम हो जाये और इनके हाथों से ये मौका फिसल जाएं।
यही डर हैं जो इन्हें गले के नीचे उतरने से रोकता हैं।
कभी तो नाभि के निचले पृष्ठ पर उतरने की कोशिश भी नहीं की।
हाँ कभी-कभी तेरे पैरों तक आ जाती हैं कि जल्दबाजी में कहीं पायल का साइज न छूट जाए।
बहुत डरती हैं ये आँखे, बिल्कुल मेरी तरह।
डरपोक आँखें।
इनका डर भी लाज़िमी हैं, क्यों कि कतार हैं मेरे आगे तेरे चाहने वालों की।
सारथी
तुम बंजारे-हम बंजारे, किसे कहाँ तक जाना हैं।
एक गली ने दुत्कारा तो दूजी बनी ठिकाना हैं।
अजल, आपदा और जुदाई जब आएगी-तब आएगी,
आज की बात तो ये हैं कि पीछे पड़ा ज़माना हैं।
रात सारी पी गए हम आँखों-आँखों, बातों बातों,
सुबह जो सूरज निकला तो आंखे ही मयखाना हैं।
उनके साथ सहर हुई तो आँखें उजली उजली हैं,
वरना सूरज आना हैं, और रात का जाना हैं।
ख़ौफ़ज़दा हैं थोड़ी सी - भूतों से वो डरती हैं,
मुझे देख के भूत भागता उसको यही बताना हैं।
उसने मुझे टोका बहुत हैं।
वो मेरा आईना बहुत हैं।
आज चलते हैं यहाँ से,
ये शहर तन्हां बहुत हैं
वो मिलता रोज़ उससे हैं,
वो शख़्स जो मेरा बहुत है।
छोड़ दे सब ख़्वाहिशों को,
ख़्वाहिशों में झगड़ा बहुत हैं।
दर्द तेरा मिल गया तो,
दर्द से वास्ता बहुत हैं।
आज फिर हम साथ में हैं,
आज फिर फ़ासला बहुत हैं।
किसने छेड़ा हैं मुक़द्दर,
आज दिल परीशां बहुत हैं।
उसने लिखा दर्द अपना,
दिल मेरा रोया बहुत हैं।
वो आज किसको रो रही,
मैंने ये सोचा बहुत हैं।
उसको बोलो बस करें अब,
मैंने भी रोका बहुत हैं।
पागलों सी क्यों हुई वो,
उसे तो तज़र्बा बहुत हैं।
हाय उसकी ज़िद का आलम,
ज़िद का पैमाना बहुत हैं।
सारथी रोको उसे तुम,
उसने तुम्हें माना बहुत हैं।
इतना भी मुख़्तसर ज़िंदगी तेरा सफ़र क्यों हैं।
जिसे पाया ही नहीं उसे खोने का डर क्यों हैं।
आख़िर मर जाना ही इन्तेहाँ हैं ज़िन्दगी में,
तो उसकी ज़ुल्फों पर मरने में नानुक़र क्यों हैं।
।।सारथी।।
जाने क्यों ना बहा समंदर।
किसके पीछे रहा समंदर।
अपनी कश्ती बीच भंवर थी,
और ज़ोर से उड़ा समंदर।
प्यास कहती रेत निचोड़ो,
अपने हिस्से कहाँ समंदर।
हरदम सहरा से घबराया,
रेत से डरा डरा समंदर।
वो तो हवा का ज़ोर था,
हमको लगा उड़ा समंदर।
मैंने उसका रस्ता खुला छोड़ दिया।
आँख खुली तो सपना आधा छोड़ दिया।
अब वो लौट के आएं भी तो कैसे,
मैंने उसको आवाज़ लगाना छोड़ दिया।
मैं भी बिल्कुल ज़माने सा हो गया हूँ,
नए चेहरा देखा और पुराना छोड़ दिया।
तेरे झूठ भी भोले साहब।
हमको कितना तोले साहब।
विकास बाबू तो आएं नहीं,
महंगे बड़े निवाले साहब।
आप तो सारा जग घूम गए,
बिल्कुल फेरीवाले साहब।
जीजा जी तो मौज करेंगे,
बहुत अमीर हैं साले साहब।
अब कैसे चौकीदार बनाएं,
अपने घर में हैं ताले साहब।
चोर की माँ को शॉल दे आए,
तुम कैसे रखवाले साहब।
आपको रोज़ ही चोर बोलते,
रणदीप सुरजेवाले साहब।
और वक़ालत खूब हैं करते,
संबित पात्रे वाले साहब।
सारथी
तुझको पाने की ख़्वाहिश में जाने क्या क्या छूट गया।
सारे दोस्त अफ़सर बन गए मैं अकेला छूट गया।
घर को संभाला ताउम्र उसने कैसी कैसी मिन्नत की,
छोटी सी एक आग लगी और बाप से बेटा छूट गया।
दुनियां का संजोग यही हैं सबको मरना पड़ता हैं,
किसका इंतज़ार रहा मुझे कि मैं ही ज़िंदा छूट गया।
तुझको पाते पाते इक दिन खुद को मिलने तरसा मैं,
मैं मुझसे भी आगे निकला मेरा खाका छूट गया।
डोली उठी जिस दिन उसकी कितनी सहमी सी थी वो,
मेहंदी वाले हाथ थे काँपे, कान से झुमका छूट गया।
बचपन-वचपन क्या होता हैं उस बच्चे को क्या मालूम,
सर पे ढोया ईंट का बोझा, हाथ से बस्ता छूट गया।
मंज़िल रसाई में क्या क्या खोया कैसे बतलाऊँ,
पाँव थे इतनी जल्दी में कि पीछे घुटना छूट गया।
पैराहन खून में लिथड़ा हैं तो आँख से शोले क्यों आएंगे।
तलवारें जब नंगी लहराती तो बात में शोले क्यों आएंगे।
कौन तमाशा अपना बनवाएं कौन हैं अपनी बेटी बिठाएं,
वो जो हैं खुद आग में कूदा उसको बचाने क्यों आएंगे।