वो इस तरह मेरे साथ दिन गुज़ारे जा रहे थे।
कि पाँव हथेली पे रखकर चले जा रहे थे।
उसकी इल्तेज़ा थी उसे आज़ाद किया जाए,
तो उसके बदन से कपड़े उतारे जा रहे थे।
बे-मन से ब्याहने का ज़ख़्म उन्हें मालूम था,
सो वो मेरे बदन पे हल्दी लगाए जा रहे थे।
मैंने उसे हँसाने के वास्ते, क्या कुछ न किया,
वो कौन लोग थे जो उसे रुलाएं जा रहे थे।
दरियां में पत्थर उछालने का शौक़ अच्छा है,
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