Wednesday, 10 April 2019

Nazm- ishq

इश्क़, -
क्या होता हैं इश्क़, दो दिलों का मिलना, या उनका बहक जाना!
दो जिस्मों से निकली हुई गर्म सांसो का एक दूसरे में घुलकर शांत हो जाना!
या किसी मंदिर या मस्ज़िद की सीढ़ियों पर किसी फकीर या अमीर के सिर का झुक जाना !
नहीं, ये इश्क़ नहीं।
ये तो ज़रूरतें हैं।

इश्क़ तो इबादत हैं ना !
और इबादत में बहका नहीं जाता।
इबादत में ज़रूरत नहीं होती।

इबादत तो फ़क़त इबादत होती हैं। जिसमे वापसी की उम्मीद नहीं होती। जिसमें खोने का डर नहीं होता।
ना किसी से गिला न कोई शिकायत!

ज़रूरतें मर जाती हैं। और इश्क़ ! इश्क़ तो ज़िंदा रहता हैं, सालों साल, सौ साल, हज़ार साल!
कभी गीतों में, कहीं ग़ज़लों में, कहीं नज़्मों में तो कहीं अफ़सानों में ढल जाता हैं इश्क़।
और उस इश्क़ में खोए हुए दो दिलों की दास्तान इतिहास के पन्नो अमर हो जाती हैं।
इश्क़ कभी नहीं मरता।

किसी पेड़ से गिरते हुए पत्ते में इश्क़ देखा हैं ?
किस तरह वो हवा में इधर उधर लहराता हुआ उस पेड़ से जुदा हो जाने के ग़म में पागल हो जाता हैं। और हवा से लड़ता रहता हैं। उसे हवा का ख़ौफ़ नहीं हैं, उसे हवा से बैर हैं, वो नफ़रत करने लग जाता हैं उसी हवा से जिसकी बदौलत वो उस पेड़ में लटककर झूमता रहा हैं, आज उसी हवा  ने उसे पेड़ जुदा किया तो वो बाग़ी हो गया।
तभी तो, तभी तो इश्क़ में बग़ावत नाजायज़ नहीं हैं, ये तो उसूल हैं इश्क़ का की जो बीच आए उससे नफ़रत हो जाती हैं।

और इश्क़ हमेशा एक तरफा होता हैं, बिल्कुल इबादत की तरह।
कभी देखा हैं उस पत्ते को पेड़ से फल मांगते हुए, नहीं ना!
वो तो फ़क़त अपने साथ उस पेड़ की टहनियों को भी लेकर झूमता रहता हैं।
हाँ! इश्क़ खुदगर्ज़ भी होता हैं, अपनी जगह किसी और को नहीं देख सकता तभी तो कभी फल या फूल पेड़ की टहनियों से लटके हो कर भी झूम नहीं सकते।
ये हक़ सिर्फ और सिर्फ पत्ते को हैं।
हाँ इश्क़ खुदगर्ज होता हैं मगर आशिक़ के लिए नहीं!
फ़क़त ज़माने के लिए अपने आसपास छुपे हुए मनचलों और गैर इश्कियां लोगो के लिए।

लेकिन इश्क़ मरता नहीं।
बस रूप बदल लेता हैं।
मेहबूब से ख़ुदा तक इश्क़ कभी नहीं मरता।

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