Monday, 15 April 2019

सोया नहीं

हो गया तुझसे ख़फ़ा मैं मगर रोया नहीं।
तुझ को पा तो ना सका हाँ मगर खोया नहीं।

चाँद में ढूंढता रहा अक्स तेरे रुखसार का,
रात सारी बीत गई और मैं सोया नहीं।

इल्ज़ाम दर इल्ज़ाम मुझको झुठलाते रहें,
ज़माने की साज़िशों से मैं मगर हारा नहीं।

नए नए चेहरों ने अक्सर तेरी ही मुलाकात दी,
तू तो फिर भी बीत गया तेरा ज़माना बीता नहीं।

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