मेरी आँखें तेरी आँखों से टकराकर सीधा तेरी मांग का सफर तय करती हैं।
फिर तेरी मांग से धीरे-धीरे फिसलती हुई तेरी नाक पर आ कर ज़रा सी देर के लिए ठहर जाती हैं कि वहाँ अपनी कोई जगह बनाएं और कोई तो निशां छोड़ जाए।
उसके बाद ये थोड़ा दाएँ तो कभी थोड़ा बाएँ सरकती हुई तेरे कानो पर जा लटकती हैं।
शायद जानती हैं कि तेरे कानों को झुमकों की तलाश हैं! और फिर बड़ी ही चालाकी से तेरे गले मे उतर जाती हैं, कमबख्त वहाँ मंगलसूत्र का साइज पता करती रहती हैं जैसे इसे इंतज़ार ही हो कि कब उसे वहाँ उतारा जाएं।
और अब तो हमेशा हमेशा के लिए वहीं ठहर गई हैं।
क्या पता कि गले का नाप कब बढ़े या कम हो जाये और इनके हाथों से ये मौका फिसल जाएं।
यही डर हैं जो इन्हें गले के नीचे उतरने से रोकता हैं।
कभी तो नाभि के निचले पृष्ठ पर उतरने की कोशिश भी नहीं की।
हाँ कभी-कभी तेरे पैरों तक आ जाती हैं कि जल्दबाजी में कहीं पायल का साइज न छूट जाए।
बहुत डरती हैं ये आँखे, बिल्कुल मेरी तरह।
डरपोक आँखें।
इनका डर भी लाज़िमी हैं, क्यों कि कतार हैं मेरे आगे तेरे चाहने वालों की।
सारथी
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