Friday, 20 December 2019
Sunday, 15 December 2019
अच्छा होता - नज़्म
Wednesday, 13 November 2019
एक पुराने दुख की यादें।
Sunday, 10 November 2019
वफ़ा है ज़ात औरत की
Saturday, 9 November 2019
जायज़ और नाजायज़
Tuesday, 3 September 2019
कहानी - नर्म गोश्त
कहानी - काली आँखें
सड़क पर पानी का तेज़ बहाव था। अब्दुल बड़ी मुश्किल से अपनी छोटी बहन फ़ातिमा का हाथ पकड़कर हवेली की तरफ बढ़ रहा था। और किसी तरह वो मदद माँगने ज़मीदार के सामने हाज़िर हुआ।
लंबी दाड़ी और डरावनी मूंछो वाले ज़मीदार ने उसके आने का सबब न पूछते हुए फ़ातिमा को घूरना शुरू कर दिया।
अब्दुल डरा हुआ, अपने दोनो हाथों को जोड़े हुए चुपचाप ज़मीदार की आंखों में मदद की परछाईं देखता रहा।
लेकिन काली आँखों वाले ज़मीदार को तो नर्म गोश्त की जैसे मंडी दिख पड़ी थी।
उसने अब्दुल से दरवाज़े के बाहर खड़ा रहने को कहा।
फिर फ़ातिमा को अपने पास बुलाकर अपनी जांघ पर बिठाया और उसे दुलारने के बहाने उस नन्ही सी जान के बदन का गोश्त नापता रहा जिससे वो अपनी भुख मिटा सकें।
फ़ातिमा को इतनी समझ भी न थी कि लगभग अधेड़ उम्र का ये आदमी उसे प्यार कर रहा हैं या अपनी अगली रात का इंतज़ाम कर रहा हैं।
अब्दुल बाहर अपने बुलाने का इंतज़ार करता रहा।
फ़ातिमा बेहद धीमी आवाज़ में भाईजान - भाईजान बुलाती रही, लेकिन उसकी आवाज़ उसी के गले मे सकपकाती रह गई।
उस डरावने आदमी के आगे !
किसी तरह अब्दुल ने हिम्मत कर के ज़मीदार को आवाज़ लगाई!
साहब भूख लगी हैं और फ़ातिमा के स्कूल की फीस भी देनी हैं।
ज़मीदार ने अपने संदूक से कुछ बिन्नीयां निकालकर अब्दुल के सामने फैंक दी।
जा अपने लिए खाना ले ले।
और फ़ातिमा ! अब्दुल ने डरी हुई आवाज़ में पूछा।
अरे बेटा इतनी तेज बारिश में कहाँ ले जाएगा इसे? आज यहीं रहने दे, सुबह आकर ले जाना।
जी।
भाईजान मुझे भी चलना हैं! फ़ातिमा बस इतना बोल पाती की ज़मीदार ने उसे घूरा।
और फ़ातिमा डर के मारे आगे कुछ न बोल पाई।
अब्दुल चला गया।
फिर फ़ातिमा को नहलाया गया उस पर खूब महंगे इत्र उड़ेले गए।
और फिर उसे ज़मीदार की खोली में उसकी काली रातों को रंगीन करने के लिए झोंक दिया गया।
पूरी रात वो वहसी उस मासूम का गोश्त नापता रहा।
और सुबह होने तक उसमें जान ना बची।
अब्दुल को बिन्नीयां निगल गई।
सुबह शहर के गंदे नाले में अब्दुल की लाश मिली।
जिसे दफ़न कर दिया गया।
लाश को या आवाज़ को।
अब्दुल की बिन्नीयां शायद खर्च होने की है।
Thursday, 22 August 2019
महफ़िल
इन महफ़िलो से वास्ता अब नई-नई सी बात नहीं।
2 212 2 22 11 12 12 2 21 12 - 29
तेरे बगैर पर महफ़िलो में महफ़िलो सी बात नहीं।
22 121 2 1112 2 1112 2 21 12 - 30
तुम ग़ैर के साथ हो गए, हम इंतेज़ार में मर गए,
2 21 2 21 2 12 2 1221 2 2 2- 29
ये भी तुम्हारी अपनी मर्ज़ी हैं, ख़ैर कोई बात नहीं।
2 2 122 22 12 2 21 22 21 12। - 31
सारथी
Wednesday, 21 August 2019
मुखौटे पे अब कौन वार करें।
आ आ ना पहली बार करें।
2222 2211 2- 16
अपना-अपना ऐतेबार करें।
2222 2221 12 - 18
मुझको तो कोई खौफ़ नहीं,
22 2 22 21 12- 16
मुखौटे पे अब कौन वार करें।
122 1 2 21 21 12 - 17
मैं झल्ला के दे मारूँगा,
2 12 2 2 222 - 15
बातें गर कोई बेकार करें।
22 2 22 221 12 - 18
इश्क़ की शाम का मुंतज़िर हूँ,
11 2 21 2 1111 2 - 15
मेहरबानी गर सरकार करें।
21122 11 1121 12 -18
Saturday, 17 August 2019
नाम अभी होने को हैं
रुको शाम अभी होने को हैं।
मेरा जाम अभी होने को हैं।
मिरे मेहबूब के होंठों पे,
मिरा नाम अभी होने को हैं।
रुको हवाओं रात होने दो।
ज़रा सितारों से बात होने दो।
मैं बहुत नाशाद हूँ।
मुझे शाद होने दो।
वक़्त के परिंदों रुको ज़रा।
ऐ मेरे रिन्दों रुको ज़रा।
मयखाना ज़रा हिजाब में हैं,
सरेआम अभी होने को हैं।
मिरे मेहबूब के होंठों पे,
मिरा नाम अभी होने को हैं।
और लाँछन लगा लेना।
मुझे फिर से दग़ा देना।
अभी रुको तो ज़रा सा लोगो।
मेरी सुनो तो ज़रा सा लोगो।
मैं सबकुछ भूल गया हूँ,
मुझे बस याद होने दो।
अभी बहुत संभला हुआ हूँ।
मुझे बरबाद होने दो।
तुम बाद में बातें कर लेना।
मैं फिर से आँखें भर लूँगा।
कुछ रिश्तों की ख़ातिर मैं,
कुछ जी लूँगा फिर मर लूँगा।
मेरा दाम अभी होने को हैं।
नाम-बदनाम अभी होने को हैं।
मिरे मेहबूब के होंठों पे,
मिरा नाम अभी होने को हैं।
Thursday, 8 August 2019
Friday, 2 August 2019
जन्नत में दोज़ख सी तन्हाई देखी हैं।
जन्नत में दोज़ख सी तन्हाई देखी हैं।
हसीन चेहरे संग सुनी कलाई देखी हैं।
हिज्र का आलम मेरे मत्थे चढ़ गया,
मैंने मेरे महबूब की सगाई देखी हैं।
मुफलिसी में रईसों सा मज़ा लिया,
कच्ची छत, रस्सी की चारपाई देखी हैं।
उसने मेरी आँखें चुम ली थी इक रोज़,
काफ़िर ने क्या खूब खुदाई देखी हैं।
जन्नत को मरना ज़रूरी नहीं लोगो,
बाप ने घर बेटी की शहनाई देखी हैं।
संदीप कुथे 'सारथी"
Tuesday, 30 July 2019
मैं हर रात तेरी यादों में ऐसे सो जाता था।
मैं हर रात तेरी याद में ऐसे सो जाता था।
आँख लगती, बिस्तर से बदन टकराता था।
मेरे तकिये आंसुओं में भीग जाया करते थे,
और मेरा कंबल मेरे बदन को सहलाता था।
रात मेरी आँखों में चाँद भरने आती थी,
मैं नींद भर तेरे ख्वाबों को सजाता था।
मेरे चाहने वाले थपकियां देने तरसते थे,
मैं तेरे हाथों को महसूस कर सो जाता था।
तेरे आरिज़ के तिल मेरी आँखों में अंधेरा करते,
तेरी आँखों के लगने से दिन ढल जाता था।
रातरानी के फूलों की खुशबू हवाओं में फैलती,
सिगरेट का धुआं मेरे फेफड़ो में समा जाता था।
सारथी
Thursday, 25 July 2019
Monday, 22 July 2019
जाने किस बात की ये उदासी हैं।
जाने किस बात की ये उदासी हैं।
दिल लबालब हैं आँख प्यासी हैं।
हम दोनों साथ रहें भी तो कैसे,
एक तो क़ाबा हैं, एक काशी हैं।
दरियाओं की लाचारी कौन समझे,
सैलाब आया है, लहर प्यासी हैं।
उसकी आँख में झांकने का हुनर,
आया जब से हमें बदहवासी हैं।
यूं तो ज़िंदगी में बड़े वसवसे हैं,
बात लेकिन ये बस ज़रा सी हैं।
Sunday, 21 July 2019
Wednesday, 3 July 2019
सुनो, एक ख़्वाब देखते हैं।
सुनो,
सुनो, एक ख़्वाब देखते हैं।
चाँद के दूसरी तरफ बैठकर,
सितारों की नज़रों से बचकर,
किसी अंधेरी सुनसान जगह में,
जहाँ कोई भी तेरी-मेरी सम्त का न हो,
जहाँ कोई मज़हब कोई ज़ात,
हमारे ख्वाबों पर अपनी पाबंदिया ना लगा सकें।
जहाँ कोई रंग, कोई ज़ुबान हमारी पहचान न हो।
कि वो ख़्वाब तेरे आरिज़ को छूकर सीधे मेरी आँखों को नींद दे जाएं।
तेरी ज़ुल्फों के पेंच-ओ-ख़म से बचते बचाते हुए मेरे ज़ेहन में सिकुड़कर बैठ जाएं।
तू आ मेरे ख़्वाबों की मल्लिका, कि हम अपने दोनों हाथों को मिलाकर एक नए जहाँ की बुनियाद रख सकें।
नया जहाँ,
जहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ मोहब्बत का वजूद हो।
चल एक आवाज़ सुनें।
चल एक आवाज़ सुनें,
दिल के पैकर से आती हुई,
रौशनी से डरी सहमी, अंधेरों में छिपती छिपाती एक आवाज़ जो अकेले कहीं शोर मचा रही हैं।
किसी मासूम बच्चे की मानिंद, बे-लिबास पैकर लिए जो आंसुओ में भीगी कुछ गुनगुना रही हैं।
तमाम रंग-ओ-बू से बेख़बर, किसी बेख़याली में खोई हुई,
मनचले ख़्वाबों से परे, किसी के इश्क़ में बेख़बर सोई हुई।
Saturday, 29 June 2019
बिछड़ने का इरादा कर रही हो ना।
तुम बिछड़ने का इरादा कर रही हो ना!
प्यार खुद से कुछ ज़्यादा कर रही हो ना!
सोचती हो दूर जाने से मोहब्बत मर जाएगी।
यानी ज़िंदगी तुम्हारे बगैर गुज़र जाएगी।
ठीक सोचती हो कि ज़िंदगी गुज़र जाएगी।
गलत सोचती हो कि मोहब्बत मर जाएगी।
मोहब्बत तो रूह के दरमियां हैं, और रूह कभी मरती नहीं ना!
और बिछड़ना तो मोहब्बत की सदाकत (सच्चाई) हैं,
या यूं कह दो की सदाकत की अलामत (लक्षण) हैं।
तो किस बिनाह पर सोच रही हो कि मोहब्बत मर जाएगी!
और कौन किससे बिछड़ सकता हैं, ना मैं तुमसे ना तुम मुझसे!
तुम तो मेरे अंदर हो और मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा।
हक़ीक़त में मुझमें तुम्हारे सिवा हैं ही क्या जिसे मैं खो दूँगा।
बताओ कैसे बिछड़ोगी!
Saturday, 15 June 2019
मैं कह दूंगा तुम मेरी हो।
कितनी मुद्दत (a bunch of time) बीती हैं, हमको तुमको इक सांस हुए।
कितने ही अल्फ़ाज़ (शब्द) लिखे हमने तेरे एहसास लिए।
उन एहसासों को उन अल्फाज़ो को,
तेरे मेरे सब जज़्बातों को।
जो दुनियां आँख उठाकर देखें,
तब दुनियां की तक़रीरों (दलीले) से,
उनकी सारी तहरीरों (गवाही) से,
कह दूँगा तुझसे दूरी हो।
मैं कह दूँगा तुम मेरी हो।
जब तुझको ज़माना डराने आये,
जब तेरा आँचल मैलाये।
तू दूर ना जाना-पास ही रहना,
मेरे दिल की आस ही रहना।
अच्छे भले सब लोगो से,
उनके सब मंसूबो (इरादे) से,
मैं लड़ूंगा तेरी ख़ातिर,
तुम तो मेरी धुरी (base) हो,
मैं कह दूँगा तुम मेरी हो।
जब शाम ढले और रात मिले,
जब सूरज का आघात मिले।
जब चांदनी भी घबरायेगी,
जब रौशनी भी लरजायेगी। ( शर्माना)
सबको हड़काउंगा खूब डराउंगा,
मैं तेरे होने से ही इतराउंगा।
सबसे कहूंगा बे मतलब हो।
एक तुम ही मेरा मज़हब हो।
इक तुम ही तो बहुतेरी हो।
मैं कह दूँगा तुम मेरी हो।
हो ग़म या कोई मुश्किल,
दीवाना तेरा नहीं बुज़दिल,
सबकुछ सहूँगा तुझ संग रहूंगा,
तेरा हूँ ना ! तेरा हूँ।
तेरा हूँ, तेरा रहूंगा।
आसमान से ऊपर हो,
हो शाम की दोपहर हो।
कोई भी मजबूरी हो,
कह दूँगा तुम मेरी हो।
हो कोई जश्न का मौसम,
कि हो पतझड़ आने को।
पहाड़ो से हो बर्फ पिघलती,
या दरिया हो उड़ जाने को।
मंदिरो की आन हो,
या मस्जिद की अज़ान हो।
दीवाली के दीप तुझी से रौशन हैं।
ईद तुझी से आती है,
हो सावन की रिमझिम,
या रमज़ान की रोज़ेदारी हो।
तुम सहरी तुम ही तो इफ्तारी हो।
मैं कह दूँगा तुम मेरी हो।
Thursday, 13 June 2019
जीने का बहाना ढूंढते हैं।
जीने का बहाना ढूंढते हैं।
कोई दर्द पुराना ढूंढते हैं।
आप तो मेरे अंदर हैं ना,
आप क्यों आईना ढूंढते हैं।
एक बरगद ढह गया आज,
परिंद आशियाना ढूंढते हैं।
मुझको भुलाकर अब देखो,
वो मुझ सा दीवाना ढूंढते हैं।
रोना तो मेरे नसीब में हैं,
आप क्यों सिरहाना ढूंढते हैं।
सारथी
Wednesday, 5 June 2019
ना बोला जाएगा ना कुछ बताया जाएगा।
ना बोला जाएगा, ना कुछ बताया जाएगा।
दर्द अपना है तो फिर खुद ही सहा जाएगा।
तुम सरेबाज़ार रोते फिरोगे तो सुनो फिर,
तुमको बारहा बेवजह ही रुलाया जाएगा।
तुम परिंद क़ैद करके क्या जता रहे हो,
मैं जानता हूँ सच को यूं ही टटोला जाएगा।
बेहतर होगा बाज़ आओ अपनी हरकतों से,
मुझसे और ज़्यादा चुप ना रहा जाएगा।
मैंने आँखों से खून बहाया हैं एक मुद्दत,
क्या समझते हो वो खून यूं ही ज़ाया जाएगा।
लौट जाओ अपने कबीलों की ज़ानिब तुम,
बुरा होगा गर मेरे खून में उबाल आ जाएगा।
Sunday, 2 June 2019
दिल की आवाज़
कौन सुनता हैं ?
आज तलक किसने सुना हैं ?
और आगे भी कौन सुनने वाला हैं ?
और अगर कोई सुनना भी चाहे तो कैसे सुने उस आवाज़ को जो सुनाई ही नहीं देती।
हाँ, दिल की आवाज़ कब किसे सुनाई देती हैं, उसे तो बाहर आते ही दफ़्न कर दिया जाता हैं।
वो आवाज़ जो चींखना भी चाहती हैं लेकिन उसके मुँह पर कोई पट्टी बांध दी जाती हैं।
लाचार बहुत लाचार सी वो आवाज़ अगर किसी तरह बाहर आ जाएं तो इस ज़माने को इसकी हक़ीक़त उसकी औक़ात से मुख़ातिब कराए।
इस चालक ज़माने ने आज तलक़ कोई कचहरी भी ना बनाई कि जहाँ दिल का कोई मुआमला दर्ज कराया जा सकें।
कोई वकील भी नहीं मिलता कि जो दिल के मुआमले की पैरवी करें और इंसाफ मिल सके।
ज़माने के महान कहे जाने वाले बड़े ही इज़्ज़तदार लोगो ने कोई कानून, कोई क़िताब भी नहीं लिखी जिसकी बिनाह पर कोई मुलाज़िम ही अपने मुआमले की पैरवी कर सके।
Monday, 20 May 2019
लौट आए
तेरी क़िताब में रखे उस सूखे हुए फूल की अहमियत जानती हैं तू!
वो पीला गुलाब मेरे लिए तेरे बदन पे लगने वाली हल्दी की मानिंद हैं।
मैं जानता हूँ कि तूने उस फूल की एक पंखुड़ी भी गिरने ना दी होगी।
क्यों कि मैं जानता हूँ तेरे लिए मेरी हर छोटी चीज़ की बड़ी अहमियत हैं।
तो क्यों हम नफ़स तू बार बार इनकार करती हैं।
क्यों कहती हैं कि तुझे मुझसे मोहब्बत नहीं रही।
क्यों तेरे आसपास उन काफ़िरो के लिए इतनी जगह हैं जो कभी मुझको भी मयस्सर ना हुई।
क्यों मैं तेरे जुड़े को मोगरे से नहीं सजा सकता।
क्यों तेरे हाथों में मेरी चूड़ियां नहीं हो सकती।
क्यों आख़िर क्यों मुझको आज भी इस डर में जीने की लाचारी हैं कि कोई और ही तेरा हाथ थामकर तुझे ले जाएगा।
मैं क्यों इस डर में जीता हूँ।
गर तुझे मुझसे मोहब्बत नहीं, गर मैं तेरा इश्क़ नहीं, गर तुझ पर मेरा कोई हक नहीं मेरी हम नफ़स तो क्यों मैं बारहा तुझे मेरी हम नफ़स लिख रहा हूँ।
क्यों मैं किसी और हाथ को नहीं थाम सकता।
इतने लंबे फ़ासलो के बावजूद क्यों मैं तेरा इंतेज़ार करता हूँ।
क्यों ?
आदमी को आदमी मयस्सर हो इतना ही तो ज़रूरी हैं ना!
तो मुझको क्यों सिर्फ तेरी मौजूदगी चाहिए।
मैं जानता हूँ तेरे पास भी इन सवालों के जवाब नहीं।
क्यों हर वक़्त तेरे लौटने का इंतेज़ार रहता हैं।
क्यों आखिर मेरा इंतेज़ार मुक़म्मल नहीं होता।
कितने लंबे फ़ासले को कितनी ही बेरहमी से मार दिया करता हूँ मैं।
कितने ही लोगो ने मुझको तेरे बारे बरगलाने की कोशिश की लेकिन क्या है कि मुझे तेरे सिवा किसी का यकीन ही नहीं होता।
कुछ तो हैं ना जो अब भी हम दोनों को बांधे हुए हैं।
क्या है वो!
मुझको तो मौसिक़ी का शौक़ हैं लेकिन क्यों हिम्मत नहीं होती कि कुछ सुन सकूं!
शायद इसीलिए कि उस दौरान तू कही से आवाज़ लगाए और मैं सुन ना सका तो !
इसीलिए मैंने मेरे मौसिक़ी के शौक़ को भी मार डाला हैं।
आखिर क्या है जो मुझको इतना लाचार और मजबूर किये हुए हैं!
कुछ तो हैं।
कुछ तो है ना मेरी जान, जो मुझको रोक लेता हैं।
उस कुछ जवाब दे।
आ लौट आ मुझको मेरा रुबाब दे।
आ कि कब से मेरी चूड़ियां तेरी कलाई में खनकने को बेताब हैं।
तुझे कसम हैं उस सूखे हुए गुलाब की ।
इस कुछ का जवाब दे और लौट आ।
तू लौट आ मेरी हम नफ़स, तू लौट आ।
Friday, 17 May 2019
नज़्म - आ
तेरे लबों पे ठहरी हुई ये खुश्क खामोशी,
तेरे गेशुओं की आड़ से झांकता हुआ ये अँधेरा,
तेरे इन कपड़ो के पीछे छुपा हुआ एक नाज़ुक सा जिस्म,
तू शायद नहीं जानती कि इस बीते वक़्त के फ़ासले ने कितना सताया हैं।
मेरी ये छोटी छोटी आंखे ये सब देखने का इंतेज़ार करते करते बन्द होने को आई थी।
तेरे बदन की खुशबू जो पिछली दफ़ा मेरे फेफड़ो में समाई थी, तू नहीं जानती मुसलसल चलता हुआ ये सिगरेट का धुआं भी उसे निकालते हुए थक सा गया हैं।
मैं क्यों रातों को जागता हूं, मेरे अंदर तो कोई रोशनी भी नहीं कि किसी की रातों को रोशन करें।
तेरे सिवा इन आँखों को कोई ख्वाब भी नहीं कि रातों नींद आ जाएं।
ये नींद की गोलियों को क्योंकर इज़ाद किया गया हैं, शायद इसीलिए की मैं मेरे अधमरे से ख्वाबो को लेकर सुकून की नींद सो सकूं।
मेरे होंठ कब से तरस गए हैं कि तुझसे बातें करें,
तेरे कानों को कोई ग़ज़ल सुनाएं।
तेरी पलकों को चूमकर तेरे सारे ख़्वाब चुराएं, कि मैं उन्हें मुकम्मल करूँ हमारे लिए।
कितनी नज़्में जो सिर्फ तेरे लिए लिखी हैं इंतेज़ार में हैं कि तू आकर उन्हें एक दफा अपनी निगाहों से निहार कर मुकम्मल कर दे तो वो सुख़न की किसी ऊंची डाल पर बैठ के इतराए।
तुझे मालूम नहीं कि तेरे इंतेज़ार में मैं कितने जंगलों, कितने पहाड़ो, कितने सहराओं, से घूमता हुआ किसी ऐसी जगह पर जा गिरा था जहाँ कुछ सूखे पेड़ो के सिवा कुछ भी न था।
वहाँ धूप भी आती थी, बारिश भी थी, मौसम बदलते भी थे, लेकिन जाने क्यों कोई पेड़ कभी सब्ज़ ना हुआ।
तू नहीं जानती पिछली बार के बाद मेरी इस्त्री भी इंतेज़ार में हैं कब तेरे दुपट्टे पर टहलने के बहाने उसे जला कर तेरे होंठो को हंसी मयस्सर करें।
अब देख कि मैं थक सा गया हूँ,
तेरी ही राह में कहीं रुक सा गया हूँ।
वो मेरे कमरे में तकिए भीग भीग कर अजीब सी बदबू करने लगे हैं।
अब की ज़िद छोड़ दे, आ अब ठहर जा।
अब की बार मान जा ,मुझको मयस्सर हो।
अबकि मेरे मर जाने जाने से तेरा लौटना बेहतर होगा।
आ कि तेरा पसीने से लथपथ माथा मेरे हाथों पे रख की मैं उसे चूम लूँ, बेस्वाद सी इस ज़ुबान को कोई स्वाद आ जाएं।
इससे पहले कि ये अकेलापन कोई अनहोनी कर बैठे, आ अपनी मौजूदगी दर्ज करा।
देख मैं ख़ुदा को पहले ही ठुकरा चुका हूँ।
आ कि तेरे हाथ बढ़ा, मेरे हाथों को थाम कि मैं तेरी इबादत करूँ, तेरा सजदा करूँ, तुझे ख़ुदा मैं करूँ।
आ मेरे ख़ुदा अपने पैरों को मेरी हथेलियों पे रख के चल कि इनमें कोई कांटा ना चुभने पाएं।
आ मेरे हम नफ़स मेरे होंठो को तेरी पलको की मौजूदगी मयस्सर कर।
मेरी इस टूटी फूटी , और पुरानी सी मोटर गाड़ी को फिर से तेरी तसरीफ के वज़न से नवाज़।
आ मेरे घर मे पहली सी रौनक आता कर, जो तेरे जाने से कहीं खो गई।
तू आ मेरी हम नफ़स तू आ।
Wednesday, 15 May 2019
चाँद का दाग
किसी के आने की उम्मीद और फिर लौट जाने का डर!
वो एक दाग जिसकी बदौलत चाँद खूबसूरत भी लगता हैं और नापाक भी कहलाता हैं।
जब जब चाँद की खूबसूरती का ज़िक्र होता हैं साथ ही साथ उस दाग का ज़िक्र भी होता हैं।
तब चाँद क्या करें!
खूबसूरती पर इतराएं या दाग पर अफ़सोस करें
मैं उसके आने की खुशी मनाऊं या लौट के जाने का ग़म!
Tuesday, 14 May 2019
चेहरा
मैंने देखा याद का चेहरा।
तेरे जितना भोला चेहरा।
मुझसे मिलते ही रुठ गया,
बिल्कुल जैसे तेरा चेहरा।
चाहता था कि मनाऊं उसे,
इसीलिए तो रूठा चेहरा।
हँसता भी हैं रोता भी हैं,
तेरा चेहरा - मेरा चेहरा।
मुझको कोई भाता नहीं,
जब से देखा तेरा चेहरा।
Thursday, 9 May 2019
तो फिर
मैं फिर तेरा तलबगार हुआ तो फिर!
मुझको तुझसे फिर प्यार हुआ तो फिर।
यूँ रोज़ रोज़ के कॉल जँचते नहीं अब,
फिर से इश्क़ का इज़हार हुआ तो फिर!
यकीं तुम्हारा नहीं गवाँरा पहले जैसा अब,
अबकि गर मैं गद्दार हुआ तो फिर!
मरहम भी अब बाज़ारो में मिलता हैं,
ज़ख़्म अगर खुद्दार हुआ तो फिर!
शर्ट
साल बा साल गुज़रते चले गए, मैंने अब भी अपनी शर्ट को स्त्री नहीं की, वो आखिरी स्त्री जो तुमने लगाई थी लगता हैं आज तलक मुसलसल जैसी की वैसी लगी हुई हैं।
और मैं अब भी खुद को उतना सी सजा हुआ महसूस करता हूँ, जबकि मैं जानता हूँ कि ये झूठ हैं, लेकिन ये झठ ही हैं जो मुझे तुम्हारे अब भी पास होने का एहसास दिलाता हैं।
और ये एहसास! यही एहसास है जो मुझको ज़िंदा रखे हुए हैं। शायद तुम्हे याद भी न हो लेकिन! लेकिन मैं अब भी इसी वहम के साथ जी रहा हूँ कि तुम अब भी मेरे पास हो।
देख रही हो न कितना झूठा हूं मैं!
खुद से भी झूठ बोलता हूँ।
अपनी शर्ट से भी झूठ बोलता हूं कि उसे स्त्री लगी हुई हैं और वो अब भी उतनी ही खूबसूरत लग रही हैं।
और मेरी शर्ट भी मेरी बात मान लेती हैं। जबकि वो भी जानती हैं कि मैं उससे झूठ बोल रहा हूँ।
लेकिन उसे पता हैं कि इसी झूठ की वजह से जिंदा हूँ मैं।
औऱ मुझे ज़िंदा रखने के लिए वो भी अपने मन को मारकर खुश रह लेती हैं।
बेचारी शर्ट !
कितना कुछ सहती हैं।
कितनी जलील होती हैं। मेरे दोस्तों की शर्ट के सामने!
जो खूब रगड़कर स्त्री की जाती हैं और सज धजकर आती हैं।
सिर्फ मेरी खुशी की खातिर।
मुझे ज़िंदा रखने की खातिर।
Wednesday, 8 May 2019
वाला था
कौन किसके डर से सबकुछ ज़ाया करने वाला था।
यार कौन किससे डरता हैं! कौन डरने वाला था।
किसकी आवाज़ पे लौटा दरिया, कौन इतना चिंखा था,
किसको प्यास लगी थी इतनी, कौन मरने वाला था।
कैसी लहर थी! किसने उछाली! कौन देश से आई थी,
किसके ख़ौफ़ से सूखा दरियां, कौन पानी भरने वाला था।
सारथी
Tuesday, 7 May 2019
में हैं
ना तो ज़मीं पे हैं ना ही आसमान में हैं।
ये ख़ुदा वुदा शायद दूसरे जहान में हैं।
हमनें तेरे वास्ते ख़ुदा तक को ठुकरा दिया,
और तू मेरी जान जाने किस गुमान में हैं।
मोहब्बत हमसे नहीं! ठीक हैं, ये बता,
आख़िर कौन हैं जो तेरे अरमान में हैं।
इक टक देखता रहता हैं सबकी निगाहों में,
जाने कितनी बातें उस बेज़ुबान में हैं।
किसकी मर्ज़ी से मैंने तुझको भुला दिया,
किसकी मर्ज़ी मेरे दिल-ओ-जान में हैं।
वो रुख़सत हो जाएगी इक दिन जानता हूँ,
ये बात कब से तो मेरे भी ध्यान में हैं।
Wednesday, 24 April 2019
तेरे नाम से आवाज़ दूँ
किस नाम को पुकारूँ मैं, किस नाम से आवाज़ दूँ।
तुझे किस तरह बुलाऊँ मैं, किस नाम से आवाज़ दूँ।
हैं जो दरमियाँ बेनाम सा एक रब्त अपने आप सा,
तेरी बंदिशों की छांव में इक शख़्स हैं मेरे आप सा,
उस रब्त को, उस शख़्स को,
अब इस तरह सुलझाऊँ मैं,
तेरे नाम से आवाज़ दूँ।
वो रूठता खुद ही से हैं, वो जूझता खुद ही से हैं।
और फिक्रमंद तुम्हारा हैं, वो छूटता खुद ही से हैं।
उस रूठे से किरदार को,
चल इस तरह मनाऊं मैं,
तेरे नाम से आवाज़ दूँ।
तू जो रूठती नहीं कभी, तू जो मुझसे राबता भी हैं।
तू जो होती ही नहीं ख़फ़ा, तुझे सब से वास्ता भी हैं।
तेरे इस सरल से भाव को,
आ इस तरह सताऊं मैं,
मेरे नाम से आवाज़ दूँ।
वक़्त ही की हैं साज़िशें सभी
वक़्त ही की हैं साजिशें सभी।
अपने दरमियाँ बंदिशें सभी।
ये कहाँ से हैं आती सदाएँ,
आती कहाँ से हैं रंजिशें सभी।
कौन आया हैं हमको तोड़ने,
कौन लाया हैं हालतें सभी।
किसकी मर्ज़ी से हम हुए ज़ुदा,
ये कौन दे गया फ़ासले सभी।
दिल की दुनियां घर उजड़ गया,
दिल की दुनियां में दीमकें सभी।
मुझको उससे क्यों रब्त इतना,
मुझको उससे हैं सोहबतें सभी।
उसकी मर्जी से नींद आती हैं,
उसकी मर्जी से करवटें सभी।
'सारथी" सुनो छोड़ो बातों को,
बातों ही से हैं उलझने सभी।
सारथी
Rhyme - waqt ne kiya kya hansi sitam
Monday, 22 April 2019
यही हादसा तो बारहा हुआ
यही हादसा तो बारहा हुआ।
कौन मेरे जाने से तन्हां हुआ।
किसकी फितरत में मिलना हुआ,
मैं उसका हुआ ना वो मेरा हुआ।
इसकी मर्ज़ी जिसे चाहे ख़ुदा करें,
दिल पर कब जोर किसका हुआ।
मैं उससे रब्त करूँ तो क्यों नहीं,
उसके जैसा और कौन मेरा हुआ।
वो क्यों कर ना मुझको रोकेगी,
सिगरेट पीने से किसका भला हुआ,
उसकी हर बात मानना गवारा हुआ।
वो एक शख़्स जैसे मेरा ख़ुदा हुआ।
सारथी
Sunday, 21 April 2019
Thursday, 18 April 2019
चले हो तुम
बदलते मौसमो की तरह चले हो तुम।
हमारे हाथों को छुड़ाकर चले हो तुम।
ये खुशबुएँ तुम्हारी रूह में समाई हैं,
कि खुशबुओं को बेचकर चले तो तुम।
मुहाल ऐसे ज़िंदगानी कर गए हो तुम,
जीते जी कफ़न उढ़ाकर चले हो तुम।
तेरे नसीब में मैं हूँ नहीं कि तू मेरे,
नसीबो को नसीबों सा कर चले हो तुम।
आवाज़ का भी सिलसिला रुक सा गया,
आवाज़ को गले में दफन कर चले हो तुम।
ये गेशुओं के घने साये आज तक़ डराते हैं,
मेरे उदास मन को छोड़कर चले हो तुम।
Wednesday, 17 April 2019
न हुआ
एक तू मेरा होकर भी मेरा ना हुआ।
और तो दुनियां में क्या-क्या ना हुआ।
मिन्नते, इल्तिज़ा वगैरह तो होता रहता हैं,
रंज इतना सा हैं इश्क़ ज़रा सा ना हुआ।
कितने ऐश तेरी मोहब्बत के नाम हुए,
सिगरेट हुई, जाम हुआ, वादा ना हुआ।
सारथी
Monday, 15 April 2019
सोया नहीं
हो गया तुझसे ख़फ़ा मैं मगर रोया नहीं।
तुझ को पा तो ना सका हाँ मगर खोया नहीं।
चाँद में ढूंढता रहा अक्स तेरे रुखसार का,
रात सारी बीत गई और मैं सोया नहीं।
इल्ज़ाम दर इल्ज़ाम मुझको झुठलाते रहें,
ज़माने की साज़िशों से मैं मगर हारा नहीं।
नए नए चेहरों ने अक्सर तेरी ही मुलाकात दी,
तू तो फिर भी बीत गया तेरा ज़माना बीता नहीं।
Saturday, 13 April 2019
नहीं
मुझमें तेरे बाद और कोई बवाल नहीं।
ज़िंदा हूँ कि मर गया कोई ख़याल नहीं।
वो भी हँसता खेलता नज़र आता हैं,
उसे भी मेरे हिज्र का कोई मलाल नहीं।
हम दोनों अपने अपने रास्ते चल पड़े हैं,
मुमकिन अब हम दोनों का विसाल नहीं।
माना कि तेरे चाहने वाले और भी हैं,
तेरे रुख़ पे मगर पहले सा जमाल नहीं।
मैं आज़ाद परिन्दों सा उड़ रहा हूँ अब,
अब तू जो करता मेरी देखभाल नहीं।
मेरे रूठने भर से टूट ही जाएगा तू,
इस तरह से भी तू मुझको संभाल नहीं।
तुझे सवाल का जवाब दूँ भी तो कैसे,
तू सवाल का जवाब हैं सवाल नहीं।
Raam
तुम प्रेम के प्रतीक निरन्तर,
तुम मर्यादा पुरुषोत्तम,
माँ पिता के आज्ञाकारी,
तुम मानव सर्वोत्तम।
ऊंच नीच के प्रथम विरोधा,
तुम सबरी के वर्णन।
वन में सालों साल बिताएं,
क्यों महल करूँ मैं अर्पण।
तुम हो अजर अमर ओ राजा,
तुम तो नहीं किसी भी मठ में।
जो मान लिया हृदय के अंदर,
तुम हो सब घट घट में।
श्री राम नवमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।।
सारथी
Wednesday, 10 April 2019
Nazm- ishq
इश्क़, -
क्या होता हैं इश्क़, दो दिलों का मिलना, या उनका बहक जाना!
दो जिस्मों से निकली हुई गर्म सांसो का एक दूसरे में घुलकर शांत हो जाना!
या किसी मंदिर या मस्ज़िद की सीढ़ियों पर किसी फकीर या अमीर के सिर का झुक जाना !
नहीं, ये इश्क़ नहीं।
ये तो ज़रूरतें हैं।
इश्क़ तो इबादत हैं ना !
और इबादत में बहका नहीं जाता।
इबादत में ज़रूरत नहीं होती।
इबादत तो फ़क़त इबादत होती हैं। जिसमे वापसी की उम्मीद नहीं होती। जिसमें खोने का डर नहीं होता।
ना किसी से गिला न कोई शिकायत!
ज़रूरतें मर जाती हैं। और इश्क़ ! इश्क़ तो ज़िंदा रहता हैं, सालों साल, सौ साल, हज़ार साल!
कभी गीतों में, कहीं ग़ज़लों में, कहीं नज़्मों में तो कहीं अफ़सानों में ढल जाता हैं इश्क़।
और उस इश्क़ में खोए हुए दो दिलों की दास्तान इतिहास के पन्नो अमर हो जाती हैं।
इश्क़ कभी नहीं मरता।
किसी पेड़ से गिरते हुए पत्ते में इश्क़ देखा हैं ?
किस तरह वो हवा में इधर उधर लहराता हुआ उस पेड़ से जुदा हो जाने के ग़म में पागल हो जाता हैं। और हवा से लड़ता रहता हैं। उसे हवा का ख़ौफ़ नहीं हैं, उसे हवा से बैर हैं, वो नफ़रत करने लग जाता हैं उसी हवा से जिसकी बदौलत वो उस पेड़ में लटककर झूमता रहा हैं, आज उसी हवा ने उसे पेड़ जुदा किया तो वो बाग़ी हो गया।
तभी तो, तभी तो इश्क़ में बग़ावत नाजायज़ नहीं हैं, ये तो उसूल हैं इश्क़ का की जो बीच आए उससे नफ़रत हो जाती हैं।
और इश्क़ हमेशा एक तरफा होता हैं, बिल्कुल इबादत की तरह।
कभी देखा हैं उस पत्ते को पेड़ से फल मांगते हुए, नहीं ना!
वो तो फ़क़त अपने साथ उस पेड़ की टहनियों को भी लेकर झूमता रहता हैं।
हाँ! इश्क़ खुदगर्ज़ भी होता हैं, अपनी जगह किसी और को नहीं देख सकता तभी तो कभी फल या फूल पेड़ की टहनियों से लटके हो कर भी झूम नहीं सकते।
ये हक़ सिर्फ और सिर्फ पत्ते को हैं।
हाँ इश्क़ खुदगर्ज होता हैं मगर आशिक़ के लिए नहीं!
फ़क़त ज़माने के लिए अपने आसपास छुपे हुए मनचलों और गैर इश्कियां लोगो के लिए।
लेकिन इश्क़ मरता नहीं।
बस रूप बदल लेता हैं।
मेहबूब से ख़ुदा तक इश्क़ कभी नहीं मरता।
जा रहे थे
वो इस तरह मेरे साथ दिन गुज़ारे जा रहे थे।
कि पाँव हथेली पे रखकर चले जा रहे थे।
उसकी इल्तेज़ा थी उसे आज़ाद किया जाए,
तो उसके बदन से कपड़े उतारे जा रहे थे।
बे-मन से ब्याहने का ज़ख़्म उन्हें मालूम था,
सो वो मेरे बदन पे हल्दी लगाए जा रहे थे।
मैंने उसे हँसाने के वास्ते, क्या कुछ न किया,
वो कौन लोग थे जो उसे रुलाएं जा रहे थे।
दरियां में पत्थर उछालने का शौक़ अच्छा है,
छाले बहुत हैं
बहुत जज़्बे हौसलें बहुत हैं।
हमने पाले सपने बहुत हैं।
गीत ग़ज़लें गा रहा हूँ पर,
मुँह में मेरे छाले बहुत हैं।
खामोशी का ये सबब हैं,
मैंने मसले उछाले बहुत हैं।
सफेदपोशो के अंदर देखो,
दाग छिटके काले बहुत हैं।
शोहरतों का गुमाँ नहीं हैं,
मैंने खोएं निवाले बहुत हैं।