Tuesday, 30 July 2019

मैं हर रात तेरी यादों में ऐसे सो जाता था।

मैं हर रात तेरी याद में ऐसे सो जाता था।
आँख लगती, बिस्तर से बदन टकराता था।

मेरे तकिये आंसुओं में भीग जाया करते थे,
और मेरा कंबल मेरे बदन को सहलाता था।

रात मेरी आँखों में चाँद भरने आती थी,
मैं नींद भर तेरे ख्वाबों को सजाता था।

मेरे चाहने वाले थपकियां देने तरसते थे,
मैं तेरे हाथों को महसूस कर सो जाता था।

तेरे आरिज़ के तिल मेरी आँखों में अंधेरा करते,
तेरी आँखों के लगने से दिन ढल जाता था।

रातरानी के फूलों की खुशबू हवाओं में फैलती,
सिगरेट का धुआं मेरे फेफड़ो में समा जाता था।

सारथी

Thursday, 25 July 2019

आज मेरे बदन के जलजले फड़फड़ा उठे।
लहू में उबाल आया आबले फड़फड़ा उठे।

राह-ए-वफ़ा में यूं जलन हावी रही कि उसने,
झरोखों से आवाज़ दी दरवाज़े फड़फड़ा उठे।

संजीदगी ये कि उसकी नर्म बाहें पिघलने पर,
होंठों पर दस्तक हुई तो डोरे फड़फड़ा उठे।

Monday, 22 July 2019

जाने किस बात की ये उदासी हैं।

जाने किस बात की ये उदासी हैं।
दिल लबालब हैं आँख प्यासी हैं।

हम दोनों साथ रहें भी तो कैसे,
एक तो क़ाबा हैं, एक काशी हैं।

दरियाओं की लाचारी कौन समझे,
सैलाब आया है, लहर प्यासी हैं।

उसकी आँख में झांकने का हुनर,
आया जब से हमें बदहवासी हैं।

यूं तो ज़िंदगी में बड़े वसवसे हैं,
बात लेकिन ये बस ज़रा सी हैं।

Sunday, 21 July 2019

ना मैं खुद का भी रहा, ना उसका भी हो पाया।

मेरे दोस्त क्यों तू भी तो मेरा नहीं हो पाया।

Wednesday, 3 July 2019

सुनो, एक ख़्वाब देखते हैं।

सुनो,
सुनो, एक ख़्वाब देखते हैं।

चाँद के दूसरी तरफ बैठकर,
सितारों की नज़रों से बचकर,
किसी अंधेरी सुनसान जगह में,
जहाँ कोई भी तेरी-मेरी सम्त का न हो,
जहाँ कोई मज़हब कोई ज़ात,
हमारे ख्वाबों पर अपनी पाबंदिया ना लगा सकें।
जहाँ कोई रंग, कोई ज़ुबान हमारी पहचान न हो।
कि वो ख़्वाब तेरे आरिज़ को छूकर सीधे मेरी आँखों को नींद दे जाएं।
तेरी ज़ुल्फों के पेंच-ओ-ख़म से बचते बचाते हुए मेरे ज़ेहन में सिकुड़कर बैठ जाएं।
तू आ मेरे ख़्वाबों की मल्लिका, कि हम अपने दोनों हाथों को मिलाकर एक नए जहाँ की बुनियाद रख सकें।

नया जहाँ,
जहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ मोहब्बत का वजूद हो।

चल एक आवाज़ सुनें।

चल एक आवाज़ सुनें,

दिल के पैकर से आती हुई,
रौशनी से डरी सहमी, अंधेरों में छिपती छिपाती एक आवाज़ जो अकेले कहीं शोर मचा रही हैं।
किसी मासूम बच्चे की मानिंद, बे-लिबास पैकर लिए जो आंसुओ में भीगी कुछ गुनगुना रही हैं।

तमाम रंग-ओ-बू से बेख़बर, किसी बेख़याली में खोई हुई,
मनचले ख़्वाबों से परे, किसी के इश्क़ में बेख़बर सोई हुई।