सुनो,
सुनो, एक ख़्वाब देखते हैं।
चाँद के दूसरी तरफ बैठकर,
सितारों की नज़रों से बचकर,
किसी अंधेरी सुनसान जगह में,
जहाँ कोई भी तेरी-मेरी सम्त का न हो,
जहाँ कोई मज़हब कोई ज़ात,
हमारे ख्वाबों पर अपनी पाबंदिया ना लगा सकें।
जहाँ कोई रंग, कोई ज़ुबान हमारी पहचान न हो।
कि वो ख़्वाब तेरे आरिज़ को छूकर सीधे मेरी आँखों को नींद दे जाएं।
तेरी ज़ुल्फों के पेंच-ओ-ख़म से बचते बचाते हुए मेरे ज़ेहन में सिकुड़कर बैठ जाएं।
तू आ मेरे ख़्वाबों की मल्लिका, कि हम अपने दोनों हाथों को मिलाकर एक नए जहाँ की बुनियाद रख सकें।
नया जहाँ,
जहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ मोहब्बत का वजूद हो।
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