Tuesday, 26 May 2020

मजदूर

तुम्हारे शहर को शहर बनाने वाले मजदूर।
तुम्हारी सोच की कच्ची संकरी गलियों को,
बड़े बड़े राजमार्गों में ढालने वाले आज,
अपने गांवो को जाने उन्हीं राजमार्गों पर,
किसी ग़ुलाम की तरह छले जा रहे हैं।

हे सत्ता में बैठे पांडवो, कौरवों,
ये कर्मप्रधान कर्ण के वंशज,
तुम्हारे किसी अंग देश के मोहताज नहीं है।
हे, एक ज़ख़्मी हुए पहिये से बने राज्य के विधाताओं,
धिक्कार है तुम्हारी इस धर्म पताका का,
जो अपनी नींव में बहे पसीने की परवाह नहीं करती।

हे केशव,
धिक्कार है तुम्हारे ईश्वर होने के दावे पर,
हम क्यों कर तुम्हारे होने का जश्न करें केशव?
जबकि तुम्हारे होते कितनी द्रोपदियों ने,
कितने अभिमन्यु तुम्हारी सियासत के चक्रब्युह में खो दिए।
तो क्या मतलब है तुम्हारे वजूद का।


Friday, 20 December 2019

तेरी तस्वीर की निगाहों में जो चमक ठहरी रहती है, 
मुसलसल मेरे इश्क़ की खनक का मौज़ू हो जाती है।
मुझे नहीं मालूम तेरे कानो में झुमके कैसे लगेंगे, फिर भी ना जाने क्यों दिल करता है कि एक दफा झुमकों को ये नसीब मयस्सर कर दूं।
बदलते मौसमों की रुत में आड़े आना मेरे बस का नहीं लेकिन, कोई रुत कोई मौसम, तेरी अंगड़ाई में रुकावट बनें तो बताना, उसे वापस क़ुदरत की बाहों भेज दूंगा।
ख़ुदा से मेरा ताअल्लुक़ कुछ बेहद नफ़रत भर तो नहीं लेकिन, जब भी तेरे बारे बात की, उसने गद्दारी ही की।
मैं जानता हूँ तेरे नसीब में छत से टपकती हुई बारिश की बूंदों से खेलना ही है, जो शायद मैं तुझको दे पाऊं।

Sunday, 15 December 2019

अच्छा होता - नज़्म

अच्छा होता गर ज़िन्दा होते,
नर, नारी और नभ के तारे।

यूं सिर फुटव्वल ना होती,
कोई खून का प्यासा ना होता।
होता भी तो कोई नेता होता,
ये संविधान बेचारा ना होता।

आदमियत ना शर्मिंदा होती,
हैवानियत ना ज़िन्दा होती।
ज़िन्दा होती गर लक्ष्मी बाई,
फिर निर्भया ना मुर्दा होती।

संसद ना अखाड़ा बनती,
जन जन का ये नारा बनती।
मज़हबी फ़रमान ना आते,
लोकनीति ही जरिया बनती।

आसमान ना आग उगलता,
चैनल सारे सच ही कहते।
ज्योतिषी सब मर जाते और,
वक़्त के तारे सच ही कहते।

अच्छा होता गर ज़िन्दा होते,
नर, नारी, और नभ के तारे।

सारथी

Wednesday, 13 November 2019

एक पुराने दुख की यादें।

एक पुराने दुख की यादें,
और आँखें भर आई है।

रात की चौखट पर चंदा ने फिर तशरीफ़ लगाई है।
तारों ने फिर आह भरी और जुगनू बूझने आए है।


सारथी

Sunday, 10 November 2019

वफ़ा है ज़ात औरत की

अभी कुछ वक्त पहले ही,
कहा उसने की छोड़ो अब,
मोहब्बत छोड़ दी हमनें,
साथ जीने मरने की,
रिवायत तोड़ दी हमनें।

बोली तुझसे लगा ये मन है,
लेकिन सर पे माँ की कसम है।
हाँ, मुझको पछताना होगा,
पर तुझको छोड़ के जाना होगा।
माना बहुत कठिन है लेकिन,
मेरे हाथ पीले करने,
तुझको भी तो आना होगा।
मेरी बिदाई की रस्मो में,
तेरा भी फ़साना होगा।

मेरी इतनी बात समझ ले,
मेरी माँ का प्यारा है तू,
तू जो उनसे दग़ा करेगा,
फिर किस बात की वफ़ा करेगा।
ऐसे मेरी जान रुला मत,
मेरी माँ तो बागीचा है,
ऐसे उसका फूल चुरा मत।

बस इतना कहना है तुझसे कि,
मुझको चाहे माफ़ न करना।
हम दोनों के किस्सों का तू,
माँ के आगे जाप न करना।
माँ तो तेरी काज़ी है रे,
उसको ऐसे मत रुलाना।
हम दोनों थे साथ कभी भी।
ये अफ़साना भूल जाना।

Saturday, 9 November 2019

जायज़ और नाजायज़

तुम्हारी सब बातें जायज़ है।
तुम्हारा मुझ पर बेवजह गुस्सा होना भी जायज़ है।
माँ की आँख के आँसू की हर बूँद भी जायज़ है।
और आख़िर क्योंकर न हो, जब उन्होंने तुम्हें अपने बाग़ में किसी फूल की पंखुड़ी की तरह पाला है।

लेकिन मेरा सवाल, मेरी तक़रार, मेरे जज़्बात, मेरी चींखती हुई कलम की आवाज़ मुझको झिझोड़ते हुए ये पूछ रहे है कि आखिर नाजायज़ क्या है ?
क्या इसका जवाब है तुम्हारे पास !
नहीं ना !

मेरे कमरे में मेरे बिस्तर के ऊपर गोल गोल घूमता हुआ ये पंखा चींख चींख कर पूछता है कि जब मेरी हवा दोनो बाज़ुओं के लिए है तो फिर तेरे बिस्तर पे ये अकेला अधमरा सा बदन क्यों पड़ा हुआ है।
क्या उसका ये सवाल नाजायज़ है।

तेरे धूप जितने पाक़ बदन को किसी और के हवाले हो जाने पर उसके चिथड़े बिखर जाने का मेरा डर नाजायज़ है।

तेरी पानी जितनी साफ़ रूह का दो मिनट की सौदेबाज़ी में नीलाम होकर बिक जाने का मेरा खौफ नाजायज़ है।

मैंने आब ए ज़मज़म से होकर गंगा और जमुना के किनारों तक आवारा फिरते हुए कितना ढूंढा कि तेरे जितना पाकपन मुझे कहीं मिल जाये, तब जाकर बनारस के उस पवित्र घाट आवाज़ आई कि गंगा की पवित्रता को गंगा में नहीं ढूंढ, वो तेरे अंदर बसी हुई उस पागल, साँवली लड़की के अलावा कहीं नहीं मिलेगी तुझको।
बता क्या माँ गंगा की वो आवाज़ जो मुझको सुनाई पड़ती है वो नाजायज़ है ?

मैंने हमारे रिश्ते को राम और सीता के जितना समर्पित, और राधा-कृष्ण के रिश्ते के जितना खुला बनाने की कोशिश की, तो क्या मेरी ये कोशिश नाजायज़ है।



नाजायज़ वो लोग है जो हमारे रिश्तें पर उंगलियां उठाते है, जो मोहब्बत में हवस की झलक ढूंढते है।
तू समझ की ये वही लोग है जिनकी शाम, शराब के ठेके पर थकान और रात तवायफ़ के पैरों में थकान और पगड़ी दोनो उतार देती है।

जायज़ और नाजायज़ की इस तक़रार में अगर कुछ हो रहा है तो हमारे प्यार की हार  हो रही है।

तेरे आरिज़ पर सजे हुए उस गहरे काले तिल से पूछ कि उसकी खूबसूरती किन होंठो के चूमने से चमकने की मोहताज है।
मेरी इस सालो साल पुरानी मोहब्बत से पूछ कि मोहब्बत और इबादत कितना फ़र्क़ रह जाता है , जब मैं तेरे वास्ते ख़ुदा तक ठुकराने का जोखिम लेता हूँ।

मेरे साथ एक कमरे और एक बिस्तर पर गुज़री हुई उन सैंकड़ो रातों से पूछ कि एक साथ होने के बावजूद दो जिस्मों के अनजान होने का सबब क्या है।
पूछ मेरे उस चादर से लिपटकर कि मोहब्बत और हवस में कितना ज़्यादा फ़र्क़ होता है।
मेरे बिस्तर के उस इकलौते और तेरे गेशुओ खुशबू और मेरे आँसुओ की बदबू से लथपथ तकिये को माँ की नाक तक ले जाना और तब उनसे पूछना कि क्या जायज़ है और क्या नाजायज़ !

तब मुझको बताना कि क्या जायज़ है और क्या नाजायज़।
तब मुझको बताना कि जायज़ और नाजायज़ की इस तक़रार में क्या पाया - क्या खोया।


Tuesday, 3 September 2019

कहानी - नर्म गोश्त

कहानी - काली आँखें

सड़क पर पानी का तेज़ बहाव था। अब्दुल बड़ी मुश्किल से अपनी छोटी बहन फ़ातिमा का हाथ पकड़कर हवेली की तरफ बढ़ रहा था। और किसी तरह वो मदद माँगने ज़मीदार के सामने हाज़िर हुआ।
लंबी दाड़ी और डरावनी मूंछो वाले ज़मीदार ने उसके आने का सबब  न पूछते हुए फ़ातिमा को घूरना शुरू कर दिया।
अब्दुल डरा हुआ, अपने दोनो हाथों को जोड़े हुए चुपचाप ज़मीदार की आंखों में मदद की परछाईं देखता रहा।
लेकिन काली आँखों वाले ज़मीदार को तो नर्म गोश्त की जैसे मंडी दिख पड़ी थी।
उसने अब्दुल से दरवाज़े के बाहर खड़ा रहने को कहा।
फिर फ़ातिमा को अपने पास बुलाकर अपनी जांघ पर बिठाया और उसे दुलारने के बहाने उस नन्ही सी जान के बदन का गोश्त नापता रहा जिससे वो अपनी भुख मिटा सकें।
फ़ातिमा को इतनी समझ भी न थी कि लगभग अधेड़ उम्र का ये आदमी उसे प्यार कर रहा हैं या अपनी अगली रात का इंतज़ाम कर रहा हैं।
अब्दुल बाहर अपने बुलाने का इंतज़ार करता रहा।

फ़ातिमा बेहद धीमी आवाज़ में भाईजान - भाईजान बुलाती रही, लेकिन उसकी आवाज़ उसी के गले मे सकपकाती रह गई।
उस डरावने आदमी के आगे !
किसी तरह अब्दुल ने हिम्मत कर के ज़मीदार को आवाज़ लगाई!
साहब भूख लगी हैं और फ़ातिमा के स्कूल की फीस भी देनी हैं।
ज़मीदार ने अपने संदूक से कुछ बिन्नीयां निकालकर  अब्दुल के सामने फैंक दी।
जा अपने लिए खाना ले ले।
और फ़ातिमा ! अब्दुल ने डरी हुई आवाज़ में पूछा।
अरे बेटा इतनी तेज बारिश में कहाँ ले जाएगा इसे? आज यहीं रहने दे, सुबह आकर ले जाना।
जी।
भाईजान मुझे भी चलना हैं! फ़ातिमा बस इतना बोल पाती की ज़मीदार ने उसे घूरा।
और फ़ातिमा डर के मारे आगे कुछ न बोल पाई।
अब्दुल चला गया।

फिर फ़ातिमा को नहलाया गया उस पर खूब महंगे इत्र उड़ेले गए।
और फिर उसे ज़मीदार की खोली में उसकी काली रातों को रंगीन करने के लिए झोंक दिया गया।
पूरी रात वो वहसी उस मासूम का गोश्त नापता रहा।
और सुबह होने तक उसमें जान ना बची।
अब्दुल को बिन्नीयां निगल गई।
सुबह शहर के गंदे नाले में अब्दुल की लाश मिली।
जिसे दफ़न कर दिया गया।

लाश को या आवाज़ को।

अब्दुल की बिन्नीयां शायद खर्च होने की है।