SARTHI KI BAAT
Poetry, story, blogs
Tuesday, 26 May 2020
मजदूर
Friday, 20 December 2019
Sunday, 15 December 2019
अच्छा होता - नज़्म
Wednesday, 13 November 2019
एक पुराने दुख की यादें।
Sunday, 10 November 2019
वफ़ा है ज़ात औरत की
Saturday, 9 November 2019
जायज़ और नाजायज़
Tuesday, 3 September 2019
कहानी - नर्म गोश्त
कहानी - काली आँखें
सड़क पर पानी का तेज़ बहाव था। अब्दुल बड़ी मुश्किल से अपनी छोटी बहन फ़ातिमा का हाथ पकड़कर हवेली की तरफ बढ़ रहा था। और किसी तरह वो मदद माँगने ज़मीदार के सामने हाज़िर हुआ।
लंबी दाड़ी और डरावनी मूंछो वाले ज़मीदार ने उसके आने का सबब न पूछते हुए फ़ातिमा को घूरना शुरू कर दिया।
अब्दुल डरा हुआ, अपने दोनो हाथों को जोड़े हुए चुपचाप ज़मीदार की आंखों में मदद की परछाईं देखता रहा।
लेकिन काली आँखों वाले ज़मीदार को तो नर्म गोश्त की जैसे मंडी दिख पड़ी थी।
उसने अब्दुल से दरवाज़े के बाहर खड़ा रहने को कहा।
फिर फ़ातिमा को अपने पास बुलाकर अपनी जांघ पर बिठाया और उसे दुलारने के बहाने उस नन्ही सी जान के बदन का गोश्त नापता रहा जिससे वो अपनी भुख मिटा सकें।
फ़ातिमा को इतनी समझ भी न थी कि लगभग अधेड़ उम्र का ये आदमी उसे प्यार कर रहा हैं या अपनी अगली रात का इंतज़ाम कर रहा हैं।
अब्दुल बाहर अपने बुलाने का इंतज़ार करता रहा।
फ़ातिमा बेहद धीमी आवाज़ में भाईजान - भाईजान बुलाती रही, लेकिन उसकी आवाज़ उसी के गले मे सकपकाती रह गई।
उस डरावने आदमी के आगे !
किसी तरह अब्दुल ने हिम्मत कर के ज़मीदार को आवाज़ लगाई!
साहब भूख लगी हैं और फ़ातिमा के स्कूल की फीस भी देनी हैं।
ज़मीदार ने अपने संदूक से कुछ बिन्नीयां निकालकर अब्दुल के सामने फैंक दी।
जा अपने लिए खाना ले ले।
और फ़ातिमा ! अब्दुल ने डरी हुई आवाज़ में पूछा।
अरे बेटा इतनी तेज बारिश में कहाँ ले जाएगा इसे? आज यहीं रहने दे, सुबह आकर ले जाना।
जी।
भाईजान मुझे भी चलना हैं! फ़ातिमा बस इतना बोल पाती की ज़मीदार ने उसे घूरा।
और फ़ातिमा डर के मारे आगे कुछ न बोल पाई।
अब्दुल चला गया।
फिर फ़ातिमा को नहलाया गया उस पर खूब महंगे इत्र उड़ेले गए।
और फिर उसे ज़मीदार की खोली में उसकी काली रातों को रंगीन करने के लिए झोंक दिया गया।
पूरी रात वो वहसी उस मासूम का गोश्त नापता रहा।
और सुबह होने तक उसमें जान ना बची।
अब्दुल को बिन्नीयां निगल गई।
सुबह शहर के गंदे नाले में अब्दुल की लाश मिली।
जिसे दफ़न कर दिया गया।
लाश को या आवाज़ को।
अब्दुल की बिन्नीयां शायद खर्च होने की है।