Monday, 20 May 2019

लौट आए

तेरी क़िताब में रखे उस सूखे हुए फूल की अहमियत जानती हैं तू!
वो पीला गुलाब मेरे लिए तेरे बदन पे लगने वाली हल्दी की मानिंद हैं।

मैं जानता हूँ कि तूने उस फूल की एक पंखुड़ी भी गिरने ना दी होगी।
क्यों कि मैं जानता हूँ तेरे लिए मेरी हर छोटी चीज़ की बड़ी अहमियत हैं।
तो क्यों हम नफ़स तू बार बार इनकार करती हैं।
क्यों कहती हैं कि तुझे मुझसे मोहब्बत नहीं रही।
क्यों तेरे आसपास उन काफ़िरो के लिए इतनी जगह हैं जो कभी मुझको भी मयस्सर ना हुई।
क्यों मैं तेरे जुड़े को मोगरे से नहीं सजा सकता।
क्यों तेरे हाथों में मेरी चूड़ियां नहीं हो सकती।
क्यों आख़िर क्यों मुझको आज भी इस डर में जीने की लाचारी हैं कि कोई और ही तेरा हाथ थामकर तुझे ले जाएगा।

मैं क्यों इस डर में जीता हूँ।

गर तुझे मुझसे मोहब्बत नहीं, गर मैं तेरा इश्क़ नहीं, गर तुझ पर मेरा कोई हक नहीं मेरी हम नफ़स तो क्यों मैं बारहा तुझे मेरी हम नफ़स लिख रहा हूँ।
क्यों मैं किसी और हाथ को नहीं थाम सकता।

इतने लंबे फ़ासलो के बावजूद क्यों मैं तेरा इंतेज़ार करता हूँ।

क्यों ?

आदमी को आदमी मयस्सर हो इतना ही तो ज़रूरी हैं ना!
तो मुझको क्यों सिर्फ तेरी मौजूदगी चाहिए।

मैं जानता हूँ तेरे पास भी इन सवालों के जवाब नहीं।

क्यों हर वक़्त तेरे लौटने का इंतेज़ार रहता हैं।

क्यों आखिर मेरा इंतेज़ार मुक़म्मल नहीं होता।

कितने लंबे फ़ासले को कितनी ही बेरहमी से मार दिया करता हूँ मैं।
कितने ही लोगो ने मुझको तेरे बारे बरगलाने की कोशिश की लेकिन क्या है कि मुझे तेरे सिवा किसी का यकीन ही नहीं होता।
कुछ तो हैं ना जो अब भी हम दोनों को बांधे हुए हैं।
क्या है वो!

मुझको तो मौसिक़ी का शौक़ हैं लेकिन क्यों हिम्मत नहीं होती कि कुछ सुन सकूं!
शायद इसीलिए कि उस दौरान तू कही से आवाज़ लगाए और मैं सुन ना सका तो !
इसीलिए मैंने मेरे मौसिक़ी के शौक़ को भी मार डाला हैं।

आखिर क्या है जो मुझको इतना लाचार और मजबूर किये हुए हैं!
कुछ तो हैं।
कुछ तो है ना मेरी जान, जो मुझको रोक लेता हैं।

उस कुछ जवाब दे।
आ लौट आ मुझको मेरा रुबाब दे।
आ कि कब से मेरी चूड़ियां तेरी कलाई में खनकने को बेताब हैं।

तुझे कसम हैं उस सूखे हुए गुलाब की ।
इस कुछ का जवाब दे और लौट आ।
तू लौट आ मेरी हम नफ़स, तू लौट आ।

Friday, 17 May 2019

नज़्म - आ

तेरे लबों पे ठहरी हुई ये खुश्क खामोशी,
तेरे गेशुओं की आड़ से झांकता हुआ ये अँधेरा,
तेरे इन कपड़ो के पीछे छुपा हुआ एक नाज़ुक सा जिस्म,

तू शायद नहीं जानती कि इस बीते वक़्त के फ़ासले ने कितना सताया हैं।
मेरी ये छोटी छोटी आंखे ये सब देखने का इंतेज़ार करते करते बन्द होने को आई थी।

तेरे बदन की खुशबू जो पिछली दफ़ा मेरे फेफड़ो में समाई थी, तू नहीं जानती मुसलसल चलता हुआ ये सिगरेट का धुआं भी उसे निकालते हुए थक सा गया हैं।

मैं क्यों रातों को जागता हूं, मेरे अंदर तो कोई रोशनी भी नहीं कि किसी की रातों को रोशन करें।
तेरे सिवा इन आँखों को कोई ख्वाब भी नहीं कि रातों नींद आ जाएं।
ये नींद की गोलियों को क्योंकर इज़ाद किया गया हैं, शायद इसीलिए की मैं मेरे अधमरे से ख्वाबो को लेकर सुकून की नींद सो सकूं।

मेरे होंठ कब से तरस गए हैं कि तुझसे बातें करें,
तेरे कानों को कोई ग़ज़ल सुनाएं।
तेरी पलकों को चूमकर तेरे सारे ख़्वाब चुराएं, कि मैं उन्हें मुकम्मल करूँ हमारे लिए।
कितनी नज़्में जो सिर्फ तेरे लिए लिखी हैं इंतेज़ार में हैं कि तू आकर उन्हें एक दफा अपनी निगाहों से निहार कर मुकम्मल कर दे तो वो सुख़न की किसी ऊंची डाल पर बैठ के इतराए।

तुझे मालूम नहीं कि तेरे इंतेज़ार में मैं कितने जंगलों, कितने पहाड़ो, कितने सहराओं, से घूमता हुआ किसी ऐसी जगह पर जा गिरा था जहाँ कुछ सूखे पेड़ो के सिवा कुछ भी न था।
वहाँ धूप भी आती थी, बारिश भी थी, मौसम बदलते भी थे, लेकिन जाने क्यों कोई पेड़ कभी सब्ज़ ना हुआ।

तू नहीं जानती पिछली बार के बाद मेरी इस्त्री भी इंतेज़ार में हैं कब तेरे दुपट्टे पर टहलने के बहाने उसे जला कर तेरे होंठो को हंसी मयस्सर करें।

अब देख कि मैं थक सा गया हूँ,
तेरी ही राह में कहीं रुक सा गया हूँ।
वो मेरे कमरे में तकिए भीग भीग कर अजीब सी बदबू करने लगे हैं।

अब की ज़िद छोड़ दे, आ अब ठहर जा।
अब की बार मान जा ,मुझको मयस्सर हो।
अबकि मेरे मर जाने जाने से तेरा लौटना बेहतर होगा।

आ कि तेरा पसीने से लथपथ माथा मेरे हाथों पे रख की मैं उसे चूम लूँ, बेस्वाद सी इस ज़ुबान को कोई स्वाद आ जाएं।
इससे पहले कि ये अकेलापन कोई अनहोनी कर बैठे, आ अपनी मौजूदगी दर्ज करा।

देख मैं ख़ुदा को पहले ही ठुकरा चुका हूँ।
आ कि तेरे हाथ बढ़ा, मेरे हाथों को थाम कि मैं तेरी इबादत करूँ, तेरा सजदा करूँ, तुझे ख़ुदा मैं करूँ।

आ मेरे ख़ुदा अपने पैरों को मेरी हथेलियों पे रख के चल कि इनमें कोई कांटा ना चुभने पाएं।

आ मेरे हम नफ़स मेरे होंठो को तेरी पलको की मौजूदगी मयस्सर कर।
मेरी इस टूटी फूटी , और पुरानी सी मोटर गाड़ी को फिर से तेरी तसरीफ के वज़न से नवाज़।

आ मेरे घर मे पहली सी रौनक आता कर, जो तेरे जाने से कहीं खो गई।

तू आ मेरी हम नफ़स तू आ।

Wednesday, 15 May 2019

चाँद का दाग

किसी के आने की उम्मीद और फिर लौट जाने का डर!
वो एक दाग जिसकी बदौलत चाँद खूबसूरत भी लगता हैं और नापाक भी कहलाता हैं।
जब जब चाँद की खूबसूरती का ज़िक्र होता हैं साथ ही साथ उस दाग का ज़िक्र भी होता हैं।
तब चाँद क्या करें!
खूबसूरती पर इतराएं या दाग पर अफ़सोस करें

मैं उसके आने की खुशी मनाऊं या लौट के जाने का ग़म!

Tuesday, 14 May 2019

चेहरा

मैंने देखा याद का चेहरा।
तेरे जितना भोला चेहरा।

मुझसे मिलते ही रुठ गया,
बिल्कुल जैसे तेरा चेहरा।

चाहता था कि मनाऊं उसे,
इसीलिए तो रूठा चेहरा।

हँसता भी हैं रोता भी हैं,
तेरा चेहरा - मेरा चेहरा।

मुझको कोई भाता नहीं,
जब से देखा तेरा चेहरा।

Thursday, 9 May 2019

आज के बाद कभी दरवाज़ें हिलाना मत।
ऐ हवा कल से मेरे घर की तरफ आना मत।

मैं हूं तन्हां तो मेरा अक्स मुझे मिलता हैं,
मेरी तन्हाई को यूं बारहा रुलाना मत।

मेरे दरीचों को तूने बड़ा सताया हैं,
मेरे दरीचे हैं मेरे बरगलाना मत।

इन अंधेरों से मुझको उल्फ़त हैं,
इन अंधेरों में रोशनी मिलाना मत।

तो फिर

मैं फिर तेरा तलबगार हुआ तो फिर!
मुझको तुझसे फिर प्यार हुआ तो फिर।

यूँ रोज़ रोज़ के कॉल जँचते नहीं अब,
फिर से इश्क़ का इज़हार हुआ तो फिर!

यकीं तुम्हारा नहीं गवाँरा पहले जैसा अब,
अबकि गर मैं गद्दार हुआ तो फिर!

मरहम भी अब बाज़ारो में मिलता हैं,
ज़ख़्म अगर खुद्दार हुआ तो फिर!

शर्ट

साल बा साल गुज़रते चले गए, मैंने अब भी अपनी शर्ट को स्त्री नहीं की, वो आखिरी स्त्री जो तुमने लगाई थी लगता हैं आज तलक मुसलसल जैसी की वैसी लगी हुई हैं।
और मैं अब भी खुद को उतना सी सजा हुआ महसूस करता हूँ, जबकि मैं जानता हूँ कि ये झूठ हैं, लेकिन ये झठ ही हैं जो मुझे तुम्हारे अब भी पास होने का एहसास दिलाता हैं।
और ये एहसास! यही एहसास है जो मुझको ज़िंदा रखे हुए हैं। शायद तुम्हे याद भी न हो लेकिन! लेकिन मैं अब भी इसी वहम के साथ जी रहा हूँ कि तुम अब भी मेरे पास हो।
देख रही हो न कितना झूठा हूं मैं!
खुद से भी झूठ बोलता हूँ।
अपनी शर्ट से भी झूठ बोलता हूं कि उसे स्त्री लगी हुई हैं और वो अब भी उतनी ही खूबसूरत लग रही हैं।
और मेरी शर्ट भी मेरी बात मान लेती हैं। जबकि वो भी जानती हैं कि मैं उससे झूठ बोल रहा हूँ।
लेकिन उसे पता हैं कि इसी झूठ की वजह से जिंदा हूँ मैं।
औऱ मुझे ज़िंदा रखने के लिए वो भी अपने मन को मारकर खुश रह लेती हैं।
बेचारी शर्ट !
कितना कुछ सहती हैं।
कितनी जलील होती हैं। मेरे दोस्तों की शर्ट के सामने!
जो खूब रगड़कर स्त्री की जाती हैं और सज धजकर आती हैं।
सिर्फ मेरी खुशी की खातिर।
मुझे ज़िंदा रखने की खातिर।

Wednesday, 8 May 2019

वाला था

कौन किसके डर से सबकुछ ज़ाया करने वाला था।
यार कौन किससे डरता हैं! कौन डरने वाला था।

किसकी आवाज़ पे लौटा दरिया, कौन इतना चिंखा था,
किसको प्यास लगी थी इतनी, कौन मरने वाला था।

कैसी लहर थी! किसने उछाली! कौन देश से आई थी,
किसके ख़ौफ़ से सूखा दरियां, कौन पानी भरने वाला था।

सारथी

Tuesday, 7 May 2019

में हैं

ना तो ज़मीं पे हैं ना ही आसमान में हैं।
ये ख़ुदा वुदा शायद दूसरे जहान में हैं।

हमनें तेरे वास्ते ख़ुदा तक को ठुकरा दिया,
और तू मेरी जान जाने किस गुमान में हैं।

मोहब्बत हमसे नहीं! ठीक हैं, ये बता,
आख़िर कौन हैं जो तेरे अरमान में हैं।

इक टक देखता रहता हैं सबकी निगाहों में,
जाने कितनी बातें उस बेज़ुबान में हैं।

किसकी मर्ज़ी से मैंने तुझको भुला दिया,
किसकी मर्ज़ी मेरे दिल-ओ-जान में हैं।

वो रुख़सत हो जाएगी इक दिन जानता हूँ,
ये बात कब से तो मेरे भी ध्यान में हैं।