तेरी क़िताब में रखे उस सूखे हुए फूल की अहमियत जानती हैं तू!
वो पीला गुलाब मेरे लिए तेरे बदन पे लगने वाली हल्दी की मानिंद हैं।
मैं जानता हूँ कि तूने उस फूल की एक पंखुड़ी भी गिरने ना दी होगी।
क्यों कि मैं जानता हूँ तेरे लिए मेरी हर छोटी चीज़ की बड़ी अहमियत हैं।
तो क्यों हम नफ़स तू बार बार इनकार करती हैं।
क्यों कहती हैं कि तुझे मुझसे मोहब्बत नहीं रही।
क्यों तेरे आसपास उन काफ़िरो के लिए इतनी जगह हैं जो कभी मुझको भी मयस्सर ना हुई।
क्यों मैं तेरे जुड़े को मोगरे से नहीं सजा सकता।
क्यों तेरे हाथों में मेरी चूड़ियां नहीं हो सकती।
क्यों आख़िर क्यों मुझको आज भी इस डर में जीने की लाचारी हैं कि कोई और ही तेरा हाथ थामकर तुझे ले जाएगा।
मैं क्यों इस डर में जीता हूँ।
गर तुझे मुझसे मोहब्बत नहीं, गर मैं तेरा इश्क़ नहीं, गर तुझ पर मेरा कोई हक नहीं मेरी हम नफ़स तो क्यों मैं बारहा तुझे मेरी हम नफ़स लिख रहा हूँ।
क्यों मैं किसी और हाथ को नहीं थाम सकता।
इतने लंबे फ़ासलो के बावजूद क्यों मैं तेरा इंतेज़ार करता हूँ।
क्यों ?
आदमी को आदमी मयस्सर हो इतना ही तो ज़रूरी हैं ना!
तो मुझको क्यों सिर्फ तेरी मौजूदगी चाहिए।
मैं जानता हूँ तेरे पास भी इन सवालों के जवाब नहीं।
क्यों हर वक़्त तेरे लौटने का इंतेज़ार रहता हैं।
क्यों आखिर मेरा इंतेज़ार मुक़म्मल नहीं होता।
कितने लंबे फ़ासले को कितनी ही बेरहमी से मार दिया करता हूँ मैं।
कितने ही लोगो ने मुझको तेरे बारे बरगलाने की कोशिश की लेकिन क्या है कि मुझे तेरे सिवा किसी का यकीन ही नहीं होता।
कुछ तो हैं ना जो अब भी हम दोनों को बांधे हुए हैं।
क्या है वो!
मुझको तो मौसिक़ी का शौक़ हैं लेकिन क्यों हिम्मत नहीं होती कि कुछ सुन सकूं!
शायद इसीलिए कि उस दौरान तू कही से आवाज़ लगाए और मैं सुन ना सका तो !
इसीलिए मैंने मेरे मौसिक़ी के शौक़ को भी मार डाला हैं।
आखिर क्या है जो मुझको इतना लाचार और मजबूर किये हुए हैं!
कुछ तो हैं।
कुछ तो है ना मेरी जान, जो मुझको रोक लेता हैं।
उस कुछ जवाब दे।
आ लौट आ मुझको मेरा रुबाब दे।
आ कि कब से मेरी चूड़ियां तेरी कलाई में खनकने को बेताब हैं।
तुझे कसम हैं उस सूखे हुए गुलाब की ।
इस कुछ का जवाब दे और लौट आ।
तू लौट आ मेरी हम नफ़स, तू लौट आ।
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