Friday, 17 May 2019

नज़्म - आ

तेरे लबों पे ठहरी हुई ये खुश्क खामोशी,
तेरे गेशुओं की आड़ से झांकता हुआ ये अँधेरा,
तेरे इन कपड़ो के पीछे छुपा हुआ एक नाज़ुक सा जिस्म,

तू शायद नहीं जानती कि इस बीते वक़्त के फ़ासले ने कितना सताया हैं।
मेरी ये छोटी छोटी आंखे ये सब देखने का इंतेज़ार करते करते बन्द होने को आई थी।

तेरे बदन की खुशबू जो पिछली दफ़ा मेरे फेफड़ो में समाई थी, तू नहीं जानती मुसलसल चलता हुआ ये सिगरेट का धुआं भी उसे निकालते हुए थक सा गया हैं।

मैं क्यों रातों को जागता हूं, मेरे अंदर तो कोई रोशनी भी नहीं कि किसी की रातों को रोशन करें।
तेरे सिवा इन आँखों को कोई ख्वाब भी नहीं कि रातों नींद आ जाएं।
ये नींद की गोलियों को क्योंकर इज़ाद किया गया हैं, शायद इसीलिए की मैं मेरे अधमरे से ख्वाबो को लेकर सुकून की नींद सो सकूं।

मेरे होंठ कब से तरस गए हैं कि तुझसे बातें करें,
तेरे कानों को कोई ग़ज़ल सुनाएं।
तेरी पलकों को चूमकर तेरे सारे ख़्वाब चुराएं, कि मैं उन्हें मुकम्मल करूँ हमारे लिए।
कितनी नज़्में जो सिर्फ तेरे लिए लिखी हैं इंतेज़ार में हैं कि तू आकर उन्हें एक दफा अपनी निगाहों से निहार कर मुकम्मल कर दे तो वो सुख़न की किसी ऊंची डाल पर बैठ के इतराए।

तुझे मालूम नहीं कि तेरे इंतेज़ार में मैं कितने जंगलों, कितने पहाड़ो, कितने सहराओं, से घूमता हुआ किसी ऐसी जगह पर जा गिरा था जहाँ कुछ सूखे पेड़ो के सिवा कुछ भी न था।
वहाँ धूप भी आती थी, बारिश भी थी, मौसम बदलते भी थे, लेकिन जाने क्यों कोई पेड़ कभी सब्ज़ ना हुआ।

तू नहीं जानती पिछली बार के बाद मेरी इस्त्री भी इंतेज़ार में हैं कब तेरे दुपट्टे पर टहलने के बहाने उसे जला कर तेरे होंठो को हंसी मयस्सर करें।

अब देख कि मैं थक सा गया हूँ,
तेरी ही राह में कहीं रुक सा गया हूँ।
वो मेरे कमरे में तकिए भीग भीग कर अजीब सी बदबू करने लगे हैं।

अब की ज़िद छोड़ दे, आ अब ठहर जा।
अब की बार मान जा ,मुझको मयस्सर हो।
अबकि मेरे मर जाने जाने से तेरा लौटना बेहतर होगा।

आ कि तेरा पसीने से लथपथ माथा मेरे हाथों पे रख की मैं उसे चूम लूँ, बेस्वाद सी इस ज़ुबान को कोई स्वाद आ जाएं।
इससे पहले कि ये अकेलापन कोई अनहोनी कर बैठे, आ अपनी मौजूदगी दर्ज करा।

देख मैं ख़ुदा को पहले ही ठुकरा चुका हूँ।
आ कि तेरे हाथ बढ़ा, मेरे हाथों को थाम कि मैं तेरी इबादत करूँ, तेरा सजदा करूँ, तुझे ख़ुदा मैं करूँ।

आ मेरे ख़ुदा अपने पैरों को मेरी हथेलियों पे रख के चल कि इनमें कोई कांटा ना चुभने पाएं।

आ मेरे हम नफ़स मेरे होंठो को तेरी पलको की मौजूदगी मयस्सर कर।
मेरी इस टूटी फूटी , और पुरानी सी मोटर गाड़ी को फिर से तेरी तसरीफ के वज़न से नवाज़।

आ मेरे घर मे पहली सी रौनक आता कर, जो तेरे जाने से कहीं खो गई।

तू आ मेरी हम नफ़स तू आ।

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