Thursday, 9 May 2019

शर्ट

साल बा साल गुज़रते चले गए, मैंने अब भी अपनी शर्ट को स्त्री नहीं की, वो आखिरी स्त्री जो तुमने लगाई थी लगता हैं आज तलक मुसलसल जैसी की वैसी लगी हुई हैं।
और मैं अब भी खुद को उतना सी सजा हुआ महसूस करता हूँ, जबकि मैं जानता हूँ कि ये झूठ हैं, लेकिन ये झठ ही हैं जो मुझे तुम्हारे अब भी पास होने का एहसास दिलाता हैं।
और ये एहसास! यही एहसास है जो मुझको ज़िंदा रखे हुए हैं। शायद तुम्हे याद भी न हो लेकिन! लेकिन मैं अब भी इसी वहम के साथ जी रहा हूँ कि तुम अब भी मेरे पास हो।
देख रही हो न कितना झूठा हूं मैं!
खुद से भी झूठ बोलता हूँ।
अपनी शर्ट से भी झूठ बोलता हूं कि उसे स्त्री लगी हुई हैं और वो अब भी उतनी ही खूबसूरत लग रही हैं।
और मेरी शर्ट भी मेरी बात मान लेती हैं। जबकि वो भी जानती हैं कि मैं उससे झूठ बोल रहा हूँ।
लेकिन उसे पता हैं कि इसी झूठ की वजह से जिंदा हूँ मैं।
औऱ मुझे ज़िंदा रखने के लिए वो भी अपने मन को मारकर खुश रह लेती हैं।
बेचारी शर्ट !
कितना कुछ सहती हैं।
कितनी जलील होती हैं। मेरे दोस्तों की शर्ट के सामने!
जो खूब रगड़कर स्त्री की जाती हैं और सज धजकर आती हैं।
सिर्फ मेरी खुशी की खातिर।
मुझे ज़िंदा रखने की खातिर।

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