तुम्हारी सब बातें जायज़ है।तुम्हारा मुझ पर बेवजह गुस्सा होना भी जायज़ है।
माँ की आँख के आँसू की हर बूँद भी जायज़ है।
और आख़िर क्योंकर न हो, जब उन्होंने तुम्हें अपने बाग़ में किसी फूल की पंखुड़ी की तरह पाला है।
लेकिन मेरा सवाल, मेरी तक़रार, मेरे जज़्बात, मेरी चींखती हुई कलम की आवाज़ मुझको झिझोड़ते हुए ये पूछ रहे है कि आखिर नाजायज़ क्या है ?
क्या इसका जवाब है तुम्हारे पास !
नहीं ना !
मेरे कमरे में मेरे बिस्तर के ऊपर गोल गोल घूमता हुआ ये पंखा चींख चींख कर पूछता है कि जब मेरी हवा दोनो बाज़ुओं के लिए है तो फिर तेरे बिस्तर पे ये अकेला अधमरा सा बदन क्यों पड़ा हुआ है।
क्या उसका ये सवाल नाजायज़ है।
तेरे धूप जितने पाक़ बदन को किसी और के हवाले हो जाने पर उसके चिथड़े बिखर जाने का मेरा डर नाजायज़ है।
तेरी पानी जितनी साफ़ रूह का दो मिनट की सौदेबाज़ी में नीलाम होकर बिक जाने का मेरा खौफ नाजायज़ है।
मैंने आब ए ज़मज़म से होकर गंगा और जमुना के किनारों तक आवारा फिरते हुए कितना ढूंढा कि तेरे जितना पाकपन मुझे कहीं मिल जाये, तब जाकर बनारस के उस पवित्र घाट आवाज़ आई कि गंगा की पवित्रता को गंगा में नहीं ढूंढ, वो तेरे अंदर बसी हुई उस पागल, साँवली लड़की के अलावा कहीं नहीं मिलेगी तुझको।
बता क्या माँ गंगा की वो आवाज़ जो मुझको सुनाई पड़ती है वो नाजायज़ है ?
मैंने हमारे रिश्ते को राम और सीता के जितना समर्पित, और राधा-कृष्ण के रिश्ते के जितना खुला बनाने की कोशिश की, तो क्या मेरी ये कोशिश नाजायज़ है।
नाजायज़ वो लोग है जो हमारे रिश्तें पर उंगलियां उठाते है, जो मोहब्बत में हवस की झलक ढूंढते है।
तू समझ की ये वही लोग है जिनकी शाम, शराब के ठेके पर थकान और रात तवायफ़ के पैरों में थकान और पगड़ी दोनो उतार देती है।
जायज़ और नाजायज़ की इस तक़रार में अगर कुछ हो रहा है तो हमारे प्यार की हार हो रही है।
तेरे आरिज़ पर सजे हुए उस गहरे काले तिल से पूछ कि उसकी खूबसूरती किन होंठो के चूमने से चमकने की मोहताज है।
मेरी इस सालो साल पुरानी मोहब्बत से पूछ कि मोहब्बत और इबादत कितना फ़र्क़ रह जाता है , जब मैं तेरे वास्ते ख़ुदा तक ठुकराने का जोखिम लेता हूँ।
मेरे साथ एक कमरे और एक बिस्तर पर गुज़री हुई उन सैंकड़ो रातों से पूछ कि एक साथ होने के बावजूद दो जिस्मों के अनजान होने का सबब क्या है।
पूछ मेरे उस चादर से लिपटकर कि मोहब्बत और हवस में कितना ज़्यादा फ़र्क़ होता है।
मेरे बिस्तर के उस इकलौते और तेरे गेशुओ खुशबू और मेरे आँसुओ की बदबू से लथपथ तकिये को माँ की नाक तक ले जाना और तब उनसे पूछना कि क्या जायज़ है और क्या नाजायज़ !
तब मुझको बताना कि क्या जायज़ है और क्या नाजायज़।
तब मुझको बताना कि जायज़ और नाजायज़ की इस तक़रार में क्या पाया - क्या खोया।