Tuesday, 26 May 2020

मजदूर

तुम्हारे शहर को शहर बनाने वाले मजदूर।
तुम्हारी सोच की कच्ची संकरी गलियों को,
बड़े बड़े राजमार्गों में ढालने वाले आज,
अपने गांवो को जाने उन्हीं राजमार्गों पर,
किसी ग़ुलाम की तरह छले जा रहे हैं।

हे सत्ता में बैठे पांडवो, कौरवों,
ये कर्मप्रधान कर्ण के वंशज,
तुम्हारे किसी अंग देश के मोहताज नहीं है।
हे, एक ज़ख़्मी हुए पहिये से बने राज्य के विधाताओं,
धिक्कार है तुम्हारी इस धर्म पताका का,
जो अपनी नींव में बहे पसीने की परवाह नहीं करती।

हे केशव,
धिक्कार है तुम्हारे ईश्वर होने के दावे पर,
हम क्यों कर तुम्हारे होने का जश्न करें केशव?
जबकि तुम्हारे होते कितनी द्रोपदियों ने,
कितने अभिमन्यु तुम्हारी सियासत के चक्रब्युह में खो दिए।
तो क्या मतलब है तुम्हारे वजूद का।