अच्छा होता गर ज़िन्दा होते,
नर, नारी और नभ के तारे।
यूं सिर फुटव्वल ना होती,
कोई खून का प्यासा ना होता।
होता भी तो कोई नेता होता,
ये संविधान बेचारा ना होता।
आदमियत ना शर्मिंदा होती,
हैवानियत ना ज़िन्दा होती।
ज़िन्दा होती गर लक्ष्मी बाई,
फिर निर्भया ना मुर्दा होती।
संसद ना अखाड़ा बनती,
जन जन का ये नारा बनती।
मज़हबी फ़रमान ना आते,
लोकनीति ही जरिया बनती।
आसमान ना आग उगलता,
चैनल सारे सच ही कहते।
ज्योतिषी सब मर जाते और,
वक़्त के तारे सच ही कहते।
अच्छा होता गर ज़िन्दा होते,
नर, नारी, और नभ के तारे।
सारथी
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