किस नाम को पुकारूँ मैं, किस नाम से आवाज़ दूँ।
तुझे किस तरह बुलाऊँ मैं, किस नाम से आवाज़ दूँ।
हैं जो दरमियाँ बेनाम सा एक रब्त अपने आप सा,
तेरी बंदिशों की छांव में इक शख़्स हैं मेरे आप सा,
उस रब्त को, उस शख़्स को,
अब इस तरह सुलझाऊँ मैं,
तेरे नाम से आवाज़ दूँ।
वो रूठता खुद ही से हैं, वो जूझता खुद ही से हैं।
और फिक्रमंद तुम्हारा हैं, वो छूटता खुद ही से हैं।
उस रूठे से किरदार को,
चल इस तरह मनाऊं मैं,
तेरे नाम से आवाज़ दूँ।
तू जो रूठती नहीं कभी, तू जो मुझसे राबता भी हैं।
तू जो होती ही नहीं ख़फ़ा, तुझे सब से वास्ता भी हैं।
तेरे इस सरल से भाव को,
आ इस तरह सताऊं मैं,
मेरे नाम से आवाज़ दूँ।
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