Sunday, 7 April 2019

आंखे मयखाना हैं

तुम बंजारे-हम बंजारे, किसे कहाँ तक जाना हैं।
एक गली ने दुत्कारा तो दूजी बनी ठिकाना हैं।

अजल, आपदा और जुदाई जब आएगी-तब आएगी,
आज की बात तो ये हैं कि पीछे पड़ा ज़माना हैं।

रात सारी पी गए हम आँखों-आँखों, बातों बातों,
सुबह जो सूरज निकला तो आंखे ही मयखाना हैं।

उनके साथ सहर हुई तो आँखें उजली उजली हैं,
वरना सूरज आना हैं, और रात का जाना हैं।

ख़ौफ़ज़दा हैं थोड़ी सी - भूतों से वो डरती हैं,
मुझे देख के भूत भागता उसको यही बताना हैं।

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