Tuesday, 9 April 2019

मेरी क़िताब

ये जो मेरी किताब हैं।
तेरे रुख़ का ये हिज़ाब हैं।

मेरे आंसुओं का सैलाब हैं,
और सिसकियों का साज़ हैं।

तेरी मोहब्बतों के नाम हैं।
मेरी अज़ीय्यतों की ज़ुबान हैं।

लिखे सब तेरे कलाम हैं,

ये किताब मेरी कुरआन हैं।

मुफ़लिसी के ढेर में,
ख़्वाहिशों के शोर में,
इक आरज़ू जगी थी जो,
उस आरज़ू की बात को,
तेरे साथ गुज़री रात को,
कुछ लफ्ज़ों में उतारा था,
जो कुछ सफ़े बनाई थी।

ये वही मेरी किताब हैं।
तेरे रुख़ का ये हिज़ाब हैं।
ये क़िताब मेरी ज़िंदगी,
जो तुमसे ना पढ़ी गई।

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