तुझको पाने की ख़्वाहिश में जाने क्या क्या छूट गया।
सारे दोस्त अफ़सर बन गए मैं अकेला छूट गया।
घर को संभाला ताउम्र उसने कैसी कैसी मिन्नत की,
छोटी सी एक आग लगी और बाप से बेटा छूट गया।
दुनियां का संजोग यही हैं सबको मरना पड़ता हैं,
किसका इंतज़ार रहा मुझे कि मैं ही ज़िंदा छूट गया।
तुझको पाते पाते इक दिन खुद को मिलने तरसा मैं,
मैं मुझसे भी आगे निकला मेरा खाका छूट गया।
डोली उठी जिस दिन उसकी कितनी सहमी सी थी वो,
मेहंदी वाले हाथ थे काँपे, कान से झुमका छूट गया।
बचपन-वचपन क्या होता हैं उस बच्चे को क्या मालूम,
सर पे ढोया ईंट का बोझा, हाथ से बस्ता छूट गया।
मंज़िल रसाई में क्या क्या खोया कैसे बतलाऊँ,
पाँव थे इतनी जल्दी में कि पीछे घुटना छूट गया।
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