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इतना भी मुख़्तसर ज़िंदगी तेरा सफ़र क्यों हैं। जिसे पाया ही नहीं उसे खोने का डर क्यों हैं।
आख़िर मर जाना ही इन्तेहाँ हैं ज़िन्दगी में, तो उसकी ज़ुल्फों पर मरने में नानुक़र क्यों हैं।
।।सारथी।।
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