Saturday, 15 June 2019

मैं कह दूंगा तुम मेरी हो।

कितनी मुद्दत (a bunch of time) बीती हैं, हमको तुमको इक सांस हुए।
कितने ही अल्फ़ाज़ (शब्द) लिखे हमने तेरे एहसास लिए।
उन एहसासों को उन अल्फाज़ो को,
तेरे मेरे सब जज़्बातों को।
जो दुनियां आँख उठाकर देखें,
तब दुनियां की तक़रीरों (दलीले) से,
उनकी सारी तहरीरों (गवाही) से,
कह दूँगा तुझसे दूरी हो।
मैं कह दूँगा तुम मेरी हो।

जब तुझको ज़माना डराने आये,
जब तेरा आँचल मैलाये।
तू दूर ना जाना-पास ही रहना,
मेरे दिल की आस ही रहना।
अच्छे भले सब लोगो से,
उनके सब मंसूबो (इरादे) से,
मैं लड़ूंगा तेरी ख़ातिर,
तुम तो मेरी धुरी (base) हो,
मैं कह दूँगा तुम मेरी हो।

जब शाम ढले और रात मिले,
जब सूरज का आघात मिले।
जब चांदनी भी घबरायेगी,
जब रौशनी भी लरजायेगी। ( शर्माना)
सबको हड़काउंगा खूब डराउंगा,
मैं तेरे होने से ही इतराउंगा।
सबसे कहूंगा बे मतलब हो।
एक तुम ही मेरा मज़हब हो।
इक तुम ही तो बहुतेरी हो।
मैं कह दूँगा तुम मेरी हो।

हो ग़म या कोई मुश्किल,
दीवाना तेरा नहीं बुज़दिल,
सबकुछ सहूँगा तुझ संग रहूंगा,
तेरा हूँ ना ! तेरा हूँ।
तेरा हूँ, तेरा रहूंगा।
आसमान से ऊपर हो,
हो शाम की दोपहर हो।
कोई भी मजबूरी हो,
कह दूँगा तुम मेरी हो।

हो कोई जश्न का मौसम,
कि हो पतझड़ आने को।
पहाड़ो से हो बर्फ पिघलती,
या दरिया हो उड़ जाने को।
मंदिरो की आन हो,
या मस्जिद की अज़ान हो।
दीवाली के दीप तुझी से रौशन हैं।
ईद तुझी से आती है,
हो सावन की रिमझिम,
या रमज़ान की रोज़ेदारी हो।
तुम सहरी तुम ही तो इफ्तारी हो।
मैं कह दूँगा तुम मेरी हो।

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