जन्नत में दोज़ख सी तन्हाई देखी हैं।
हसीन चेहरे संग सुनी कलाई देखी हैं।
हिज्र का आलम मेरे मत्थे चढ़ गया,
मैंने मेरे महबूब की सगाई देखी हैं।
मुफलिसी में रईसों सा मज़ा लिया,
कच्ची छत, रस्सी की चारपाई देखी हैं।
उसने मेरी आँखें चुम ली थी इक रोज़,
काफ़िर ने क्या खूब खुदाई देखी हैं।
जन्नत को मरना ज़रूरी नहीं लोगो,
बाप ने घर बेटी की शहनाई देखी हैं।
संदीप कुथे 'सारथी"
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