तुम भी कितनी भोली हो किन बातों में आन गई।
तुम तो मुझसे रूठी थी न फिर उससे क्यों मान गई।
हर रात सुला देती थी मुझको लोरी लगती थी,
अब कोई सदां नहीं आती जाने कहाँ वो ज़ुबान गई।
थका हारा बैठा था दरियां किनारे तन्हां मैं,
भंवरो से तेरी तस्वीर बनी और मेरी थकान गई।
तू जो ज़िन्दगी से रुख़सत हुई तो लगा जैसे,
मस्जिद से रूठकर कोई अज़ान गई।
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