आराधना की प्रीत हो।
तुम मधुर प्रेम गीत हो।
चल-विचल में जो रहें।
जल या थल में जो रहें।
तुम बिलखती आँख हो।
तुम मचलती बात हो।
तुम भक्ति का श्रृंगार हो।
तुम जो भी हो हजार हो।
प्रेम भावना का सार हो।
हाँ तुम मुझसे स्वीकार हो।
हाँ तुम मुझे स्वीकार हो।।
हाँ तुम मुझे स्वीकार हो।।।
दर्पणों की आँख में,
अश्रुओं की बात में,
खामोशी की आवाज में,
सिसकियों के साज़ में,
रूठने की चाह में,
टूटने की आह में,
बाज़ुओं की छांव में,
पीपलों के गांव में,
तुम विलय अपार हो,
साधना का सार हो।
हाँ तुम मुझे स्वीकार हो।
श्रंगार तेरी चाह में हैं,
रूप तेरी राह में हैं,
चाँद, जुगनू, ओस, कलियां,
ये सब तेरी पनाह में हैं।
संस्कारों की हो राजधानी,
सुशीलता की हो निशानी,
राम-सीता की कहानी,
राधा-कृष्ण की जुबानी।
मीरा की कंठ तार हो,
तुम नदी की धार हो।
कश्मीर सी बाहर हो।
मेरी स्वप्न सार हो।
हाँ तुम मुझे स्वीकार हो।
सारथी
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