Thursday, 28 March 2019

तू भी हैं और मैं भी हूँ।

नादानी की एक निशानी तू भी हैं और मैं भी हूँ।
वस्ल हिज्र की एक कहानी तू भी हैं और मैं भी हूँ।

रूह तो अपना काम करेगी लेकिन बात तो ये भी हैं,
थोड़े थोड़े से जिस्मानी तू भी हैं और मैं भी हूँ।

दुनियांदारी क्या होती हैं हम दोनों को मालूम हैं,
अपनी-अपनी आंख का पानी तू भी हैं और मैं भी हूँ।

किसने किसको दग़ा दिया दोनों ही इनकार करें हैं,
कतरे कतरे की बेईमानी तू भी हैं और मैं भी हूँ।

आँखों आंखों बात को कहना हम दोनों को आता हैं,
इक दूजे की प्रेम निशानी तू भी हैं और मैं भी हूँ।

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