Poetry, story, blogs
ग़ज़ल नई गुनगुना रहा हूँ मैं। अब तुझको भुला रहा हूँ मैं।
ज़माने से रुसवा इस कदर हुआ, खुद ही खुद को मना रहा हूँ मैं।
उलझ गया मंज़िलो के ताने बाने में, यार छोड़ो अब घर जा रहा हूँ मैं।
आँखों ने इनकार कर दिया सो, अब दिल को सुला रहा हूँ मैं।
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