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संजीदगी अब खलने लगी हैं। आवारगी साथ चलने लगी हैं।
ज़िंदगी का बोझ उतर गया, लाश पानी पर तैरने लगी हैं।
ज़रा सी बिखरी थी कल वो भी, आज फिर हँसने खेलने लगी हैं।
मेरे पिन्दार तलक आ गयी थी, कमबख्त मेरे पैर मलने लगी हैं।
सारथी
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