सोचता हूं के अब सूरज को भी आंख दिखाया जाए,
बहुत रोशनी लिए फिरता है इसे औकात दिखाया जाए।
बहुत ग़ुरूर है आसमाँ को ऊंचाई पर तो चलो,
फिर इसे अपने बुजुर्गों का रुबाब दिखाया जाए।
ये बारिशें भी बहुत इतराती है आजकल मौसम में,
अब इन्हें भी अपनी आंखों का आब दिखाया जाए।
होगा हसीन बहुत चाँद पर मिरे मेहबूब सा तो नही,
उसे चूड़ी, कंगन, झुमके और हिज़ाब दिखाया जाए।
वो बच्चा बहुत तन्हां से रहने लगा हैं देखो 'सारथी",
छुपा कर सब ज़ख़्मो को उसे कोई ख़्वाब दिखाया जाए।
©sandeep_sarthi
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