Monday, 8 October 2018

ग़ज़ल - डर लगता हैं

उल्टे-सीधे पैमानें से डर लगता हैं।
ज़िंदगी तेरे याराने से डर लगता हैं।

यादों में इक उम्र गुज़ारी हैं मैंने,
तेरी आँखों के मयख़ाने से डर लगता हैं।

तेरी इबादतों में इस क़दर रुसवा हुआ हूं,
अब तो मुझको बुतखाने से डर लगता है।

ज़िंदगी ने ज़ख्मो का जो अंबार दिया है,
फिर मुझको ज़िंदा रहने से डर लगता हैं।

आँसुओ को मैं अब पलको में छुपा लेता हूँ,
अब इन बच्चो को बहाने से डर लगता हैं।

Sandeep 'sarthi"

No comments: