हम हर मसले का तोड़ जज़्बाती लगाते है।
ग़ुरूर उफ़ान पर हो माथे पर मिट्टी लगाते हैं।
जब-जब ये सियासतें नफरतें उगलती है,
हम मस्जिद में जा कर आरती लगाते हैं।
जब सूरज भी रौशनी देने से इनकार कर देता हैं,
हम अपने घर मे दीया और बाती लगाते हैं।
उसके पैदा होने पर बहुत मातम मनाया था,
रुख़सत होती हैं तो बाबा छाती से छाती लगाते हैं।
हम ज़िंदा हैं तो लिखते हैं कि लिखने को ज़िंदा हैं,
गुमाँ आप करें हम नाम के आगे 'सारथी" लगाते हैं।
संदीप 'सारथी"
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