तू इश्क़ हैं मेरी ज़िंदगी, मेरी बंदगी,
मेरी ख्वाहिशें, मेरी आरज़ू, मेरी आबरू।
मेरे पास हैं तेरी दिल्लगी,
तेरी ज़ुल्फों में छुप जाऊँ मैं,
तेरे साथ ही रुक जाऊँ मैं,
तेरी शान में झुक जाऊँ मैं।,
तू फूल हैं गुलाब का,
तुझे तोड़ने - मरोड़ने की ज़ुर्रतें जो करे,
तुझे कांटने - छांटने की ज़ुर्रतें जो करे,
तेरी पंखुड़ी बिखेरने की ज़ुर्रतें जो करें!
उन काफ़िरो - उन जाहिलो की आंखों में किसी काँटे सा चुभ जाऊँ मैं।।
कि ये समां तो संगीन हैं,
इक तू ही तो रंगीन हैं,
ये रंग तुझमे हैं ना जो,
ये ढंग तुझमें हैं ना जो,
इस रंग को इस ढंग को,
जो उजाड़े जो बिगाड़े,
उन क़ातिलों उन पापियों,
उन वाहियात जातियों,
की नब्ज को कुरेद दूँ,
उन काफ़िरो के खून में,
उन जाहिलो की सांस में,
मैं ज़हर बनता सा फिरूँ,
ये साज़ जो तेरे संग हैं,
आवाज़ जो तेरे संग हैं।
तेरी गुफ़्तगू में छिपी - छिपी,
तेरी खामोशी क्या बोलती,
तेरे गेशुओं की आड़ मे,
जो उदासी टहल रहीं।
उस खामोशी को तोड़ दूं।
मैं ये उदासी झिंझोड़ दूँ।
तेरे होंठो पे, तेरी आँख में,
निकलूँ तेरी हर बात में,
तेरे दर्द का तेरे मर्ज़ का,
मरहम कोई बन जाऊं मैं।
ये सांस जब तक भी चले,
ये गुलाब जब तक हैं खिलें!
किसी काँटे सा तुझमें रहूँ,
कोई हाथ जो तुझ पर बढ़े,
कोई आँख जो तुझ पर उठे,
आवाज़ जो तुझे चुप करें!
उस हाथ को घायल करूँ,
उस आँख में चूभ जाऊँ मैं।
उस साज़ को आवाज़ को,
उसी गले तले मैं रौंद दूँ।
मैं भले मिट जाऊँ पर,
तू फूल हैं - तेरी पंखुड़ी, तेरे रंग को, तेरे ढंग को, आवाज़ को तेरे साज़ को,
मैं करूँ महफूज़ और तू मुझे महफूज़ कर।
तू मुझे महफूज़ कर।
तू मुझे महफूज़ कर।
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