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1 21 1 21 21 1 2 मैं आदमी तो फ़क़त आदमी भी नहीं। ये मेरा सलीका-ए-ज़िन्दगी भी नहीं।
दुश्मन को आँख दिखाना लाज़िम हैं, मगर क्या जब आंख में पानी भी नहीं।
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