कुछ तो ज़माने की बात कर लेते हैं।
कुछ तेरे साये से मुलाक़ात कर लेते हैं।
कुछ तो ख़्वाब दिन में रूबरू होते हैं,
और कुछ के लिए रात कर लेते हैं।
कितना हसीन सबब हैं आशिक़ी का,
तो क्यों न फिर से शुरुआत कर लेते हैं।
बेसाख़्ता ही छा जाते हैं बादल आँखों में,
फिर हम आँखों से बरसात कर लेते हैं।
No comments:
Post a Comment